श्रीरामकृष्ण परमहंस के माधुर्य भाव की साधना : भाग-२
श्रीरामकृष्ण श्रीमती राधा रानी के बिना श्रीकृष्ण-दर्शन असम्भव जानकर उन्ही की उपासना में मग्न हो गये और अपने हृदय की व्याकुलता उनके चरणों मे निवेदन करने लगे।
ऐसी तन्मयता में कुछ दिन बीतने पर उन्हें श्रीराधा का दर्शन हुआ और उन्होंने पहले देव-देवियो के समान श्रीराधा को भी अपने शरीर मे प्रविष्ट होते देखा ! वे कहते थे -
"श्रीकृष्ण प्रेम में अपना सर्वस्व स्वाहा करने वाली,अनुपम पवित्रोज्जवल मूर्ति की महिमा और उसके माधुर्य का वर्णन करना असम्भव है। श्रीमती की कांति नागकेशर पुष्प के पराग के समान गौरवर्ण थी।"
इस समय से इनके मन मे यह टृढ भावना हो गयी की "मैं स्वयं राधा हूँ।"
उनमे उपरोक्त दर्शन से श्रीमती राधा और श्रीगौरांग के मधुर भाव की पराकाष्ठा से उत्पन्न होने वाले महाभाव के सभी लक्षण दिखाई देने लगे। वैष्णव आचार्यो के ग्रन्थो में महाभाव के लक्षणों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। वैष्णव तंत्र में प्रवीण भैरवी ब्राह्मणी तथा वैष्णवचरण आदि शास्त्रज्ञ साधको ने, श्री रामकृष्ण में सभी महाभाव के लक्षणों को देख आश्चर्यचकित होकर और उन्हें अवतार जानकर उनकी स्तुति की।
इस बात की चर्चा करते हुए श्रीरामकृष्ण ने हमसे कई बार कहा कि ---
"उन्नीस प्रकार के भाव एक ही जगह प्रकाशित होने से वह महाभाव कहलाता है। जन्म भर साधना करके साधक अधिक से अधिक एक या दो भाव मे सिद्धि प्राप्त कर सकता है। (अपनी ओर उंगली दिखाकर) यहाँ केवल एक ही आधार से एक ही जगह सभी उन्नीस भाव पूर्ण रूप से प्रकाशित है।"
"मैं उस (महाभाव की )अवस्था में तीन दिन तक संज्ञाशून्य होकर एक ही स्थान में पड़ा था। सचेत होने पर ब्राह्मणी मुझे पकड़कर स्नान कराने के लिये ले गयी। परन्तु शरीर हाथ लगाने योग्य न था ! शरीर पर एक चादर भर पड़ी थी। उसी को पकड़कर मुझे वह ले गयी। शरीर मे लगी हुई मिट्टी भी जल गई थी।"
उन्हें श्रीमती राधा का दर्शन और उनकी कृपा होने के बाद ही सच्चिदानंदघन भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन का भी शीघ्र ही लाभ हुआ। वह श्रीकृष्ण मूर्ति नित्य के समान उनके शरीर मे प्रविष्ट हो गई।
हमने उनके मुख से सुना है की वे इस समय श्रीकृष्ण चिंतन में इतने मग्न और तन्मय रहते थे की उन्हें अपने पृथक अस्तित्व की पूरी विस्मृति होकर "मैं स्वयं श्रीकृष्ण हूँ" ऐसा बोध हुआ करता था।
एक दिन वे विष्णुमन्दिर में श्रीमद्भागवत सुन रहे थे। सुनते सुनते उन्हें भावावेश में श्रीकृष्ण की ज्योतिर्मयी मूर्ति का दर्शन हुआ उस मूर्ति के चरणकमलों से धागे के समान दो ज्योतियां बाहर निकली। उनमे से एक तो उस भागवत् की पोथी को स्पर्श करके रह गयी और दूसरी उनके वक्षस्थल से चिपक कर रह गई।
वे कहते थे---
" इस दर्शन से मेरे मन मे ऐसी टृढ धारणा हो गई की यद्यपि भागवत, भक्त और भगवान भिन्न भिन्न दिखाई देते है तथापि ये यथार्थ में एक ही है। एक ही के तीन रूप है।"

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