प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 6 - महापुरुष 🌿
पुन: शुकदेव परमहंस कहते हैं -
ईश्वराणां वच:सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।
तेषां यस्त्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ॥ (भाग. 10-33-32)
अर्थात् महापुरुष के उपदेश माननीय हैं, आचरण तो वे ही माननीय हैं जो हमारी कक्षा के ही हैं ।अपनी कक्षा से परे के आचरण हमारा पतन कर देंगे । पुन: शुकदेव जी कहते हैं -
कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते ।
विपर्ययेण वानर्थो निरहंकारिणां प्रभो ॥ (भाग. 10-33-33)
अर्थात् शुभ कर्म करने का महापुरुषों का कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि वे कृतकृत्य हो चुके हैं एवं अशुभकर्म से उनका अनर्थ भी नहीं होगा क्योंकि उनकी वासनायें समाप्त हो चुकी हैं । वे तो परार्थ की भावना से ही सब कुछ करते हैं । पुन: शुकदेवजी ने समझाया कि -
यत्पादपंकजपरागनिषेवतृप्तायोगप्रभाव विधुताखिलकर्मबन्धा: ।
स्वैरं चरन्ति मनुयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छायाऽऽत्त वपुष: कुत: एव बन्ध: ॥ (भाग. 10-33-35)
अर्थात् जिनके चरण कमलों की रज का सेवन करके भक्तजन तृप्त हो जाते हैं, जिनके साथ योग प्राप्त करके उसके प्रभाव से योगीजन सारे कर्मबंधन काट डालते हैं, विचारशील ज्ञानिजन जिनके तत्व का विचार करके तत्स्वरूप हो जाते हैं, उन्हीं भक्तों की इच्छा से भगवान् अपना चिन्मय श्री विग्रह प्रकट करते हैं । तब भला उन भगवान् में कर्मबन्धन की कल्पना कैसे हो सकती है ? अर्थात् जब योगीजन एवं भक्त ही आसक्ति रहित कर्म करते हैं एवं उनके फल से पृथक् रहते हैं तो ईश्वर के लिए प्रश्न ही व्यर्थ है । अरे, संसार में भी प्रत्येक कर्म का फल भावना से सम्बन्ध रखता है । किसी ने किसी का खून कर दिया तब तो फाँसी होगी किन्तु यदि यह सिद्ध हो जाय कि इसकी मंशा खून करने की नहीं थी, यह तो अचानक हो गया तो उसे फाँसी नहीं दी जाती, फिर वहाँ तो बात ही और है क्योंकि ईश्वर ही कर्ता बन जाता है ।
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