श्रीरामकृष्ण परमहंस के माधुर्य भाव की साधना : भाग १



श्री रामकृष्ण परमहंस का माधुर्य भाव (भाग - प्रथम)

मधुर भाव की साधना के दौरान श्रीरामकृष्ण को स्त्रियोचित वेश धारण करने की इच्छा हुई तो परम् भक्त मथुर बाबू ने उनकी इच्छा जानकर बहुमूल्य स्त्रियोचित वस्त्र और आभूषण मंगवा दिए।
स्त्रीवेश धारण करने में उन्होने बिल्कुल आगा-पीछा नहीं किया। वे बारम्बार यही शिक्षा देते थे की "लज्जा,घृणा,भय और जन्म,जाति कुल, शील आदि अष्टपाशो का समूल त्याग किये बिना ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में कभी किसी की उन्नति नही हो सकती।"
कुछ व्यक्तियों ने मथुर बाबू की इस भक्तिपूर्ण उदारता और श्रीरामकृष्ण के त्याग को बदनाम करके उन्हें कलंक लगाने में कोई कसर नही छोड़ी थी।
सुंदर वस्त्रालंकारों से विभूषित होकर श्रीरामकृष्ण ब्रज-गोपियों के भाव मे इतने तन्मय हो गये थे कि अपने पुरुषपन का ज्ञान उनके मन से समूल नष्ट हो गया था, उनकी बोलचाल,उनका कार्यकलाप इतना ही नही उनके विचार भी स्त्रियों के समान हो गए थे। छः महीने तक ये स्त्री वेश में रहे।
लगभग इसी समय मथुर बाबू कभी -कभी अपने बाड़े में श्रीरामकृष्ण को रहने के लिये ले जाते थे। वहाँ रहते समय श्रीरामकृष्ण घर के स्त्री समाज में ही उठते- बैठते थे।
अब तो उनका वेश और व्यव्हार भी स्त्रियों के समान देखकर वे स्त्रियां उनके अद्भुत कामगन्धहीन प्रेम से इतनी मुग्ध हो गयी थी की वे उनको अपने मे से ही एक समझने लगी थी।

भैरवी ब्राह्मणी कहती थी की फूल तोड़ते समय उन्हें देखकर मुझे कई बार यही भास होता कि ये साक्षात् श्रीमती श्रीराधा रानी ही है।
वे फूल तोड़कर उनसे सुंदर मालाएं गूथते और श्रीराधा गोविंद जी को पहनाते थे कभी कभी तो जगदम्बा को पहना देते थे जैसे ब्रज गोपिकाएं कात्यायनी से प्रार्थना करती थी ,उसी प्रकार वे भी 'श्रीकृष्ण मुझे पति मिले' ऐसी प्रार्थना गदगद हृदय से करते थे।
रात-दिन श्रीकृष्ण दर्शन की एक समान धुन लगी रहती थी और श्रीकृष्ण को ही पति रूप मे पाने के लिये वे अत्यंत व्याकुल होकर प्रार्थना करते थे। इसी प्रकार उनके दिन पर दिन,सप्ताह पर सप्ताह और महीने पर महीने व्यतीत हो जाते थे, पर उनके में निराशा और अविश्वास का चिह्न भी नही था।
उनके हृदय की व्याकुलता इतनी बढ़ गयी की आहार-निद्रा आदि तक सुधि नही रहती थी। 
वे यह सोचकर की इतने व्याकुल हृदय से भी प्रार्थना करने पर श्रीकृष्ण दर्शन नही हो रहा है, रो रोकर व्यथित हो जाते थे, अपना मुँह पृथ्वी पर रगड़ डालते थे और श्रीकृष्ण विरह के दुःख से बेहोश होकर भूमि पर अचेत गिर पड़ते थे।
श्रीकृष्ण विरह से उनके शरीर मे पहले के समान पुनः दाह होने लगा। उनके शरीर मे आग की सी जलन निरन्तर होने लगी।अंत मे वह वेदना उन्हें असह्य हो गयी।
श्रीरामकृष्ण स्वयं कहते थे की "उस समय श्रीकृष्ण के अत्यंत दुःसह विरह के कारण मेरे प्रत्येक रोमकूप मे से बूंद-बूंद रक्त बाहर निकलने लगा।
मैं जिस जगह बैठता था वहाँ की जमीन मेरे शरीर के दाह से जल जाती थी।"
                                            क्रमशः-----

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 9)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)