प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 2 - ईश्वर का स्वरूप🌿
वेदव्यासानुसार उसे ब्रह्मा, शंकरादि भी नहीं जानते -
नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदुर्न वामदेव: किमुतापारे सुरा: ।
तन्मायया मोहितबुद्धयस्त्विदं विनिर्मितं चात्मसमं विचक्ष्महे ॥ (भा॰ 2-6-36 )
वेद कहता है, ऐसा ईश्वर तीन स्वरूप वाला है -
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नात: परं वेदितव्यं हि किञ्चित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ (श्वे॰ 1-12)
अर्थात् तीन प्रकार के ईश्वर को जानना होगा, तब माया निवृत्ति होगी । प्रथम भोक्ता ब्रह्म, द्वितीय भोग्य ब्रह्म, तृतीय प्रेरक ब्रह्म । प्रेरक ब्रह्म के विषय में ऊपर बता ही चुका हूँ । भोक्ता ब्रह्म के विषय में वेद कहता है -
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च ॥ (कठो॰ 1-3-3)
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयान्स्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण: ॥ (कठो॰ 1-3-4)
विज्ञानसारथिर्यस्तु मन: प्रग्रहवान्नर: ।
सोऽध्वन: पारमाप्नोति तद्विष्णो: परमं पदम् ॥ (कठो॰ 1-3-9)
अर्थात् आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, ऐसे आत्मेन्द्रिय-मन-बुद्धि-युक्त तत्व को भोक्ता-ब्रह्म कहा जाता है ।
भोग्य-ब्रह्म के विषय में वेद कहता है -
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वी: प्रजा: सृजामानां सरूपा: ।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोन्य: ॥ (श्वे॰ 4-5)
अर्थात् वह भी अजा है । इसका भी कभी प्रारम्भ नहीं है, अनादि अनंत है, उसे माया कहते हैं । यह तीन गुणों (सत्व, रज, और तम) वाली है किन्तु ऊपर कहा जा चुका है कि ये तीनों बुद्धि से परे हैं ।
अब विचारणीय है कि -
बुद्धि से भी जब ईश्वर अग्राह्य है तो हम कैसे आशा करें कि वह हमारी समझ में आ जायगा? और बिना जाने विश्वास न होगा, बिना विश्वास के उसकी प्राप्ति न होगी एवं बिना उसकी प्राप्ति हुए परमानन्द का परम चरम लक्ष्य न हल होगा । वेद कहता है -
'तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरा:'
'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।'
'तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय।' (श्वे॰ 3-8)
अर्थात् उस ईश्वर को जानने वाले भी हुए हैं । एक ओर ईश्वर को सर्वथा अज्ञेय, अदृष्ट आदि कहा जाता है और दूसरी ओर दृष्ट और ज्ञेय कहा जाता है, यह समस्या कैसे हल हो? आइये, इस पर विचार करें ।
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अध्याय 2 सम्पूर्ण
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