प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 9)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 9) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

हमारे यहाँ न्याय-वैशेषिकादि दर्शन शास्त्रों ने अनुमान-प्रमाण से यह सिद्ध किया है कि सृष्टि को देखकर यह अनुमान किया जाता है कि इसका स्रष्टा अवश्य कोई न कोई सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान भगवान् है । क्योंकि दो प्रकार के कार्य होते हैं एक प्राणीकृत अर्थात मानवकृत, दूसरे ईश्वरकृत । इनमें मनुष्यकृत कार्य तो आप जानते ही हैं, प्रतिदिन करते ही हैं, किन्तु जो कार्य मनुष्य नहीं कर सकता, वह ईश्वरकृत कहलाता है जैसे नदी, पहाड़, चन्द्र, सूर्यादि लोक निर्माण । 

न प्राणिबुद्धिभ्योऽसंभवात् 

तर्क यह देते हैं कि -"पर्वतो वह्निमान धूमवत्वात् " ( न्याय )

अर्थात् जैसे किसी पर्वत पर धुआँ दिखाई पड़ता है तो अनुमान लगाया जाता है कि उस पर्वत पर आग अवश्य है, क्योंकि यह नियम है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य होती है ।  

यह अनुभव की बात सर्वमान्य है कि किसी भी कार्य की सिद्धि में कई कारणों की आवश्यकता है । जैसे, एक घडे के निर्माण में यदि कोई प्रश्न करे कि घड़ा कैसे बना तो साधारण उत्तर यह भी हो सकता है कि मिट्टी से बना । किन्तु क्या मिट्टी स्वयं घड़ा बन गयी । तब दूसरा विशेष उत्तर दिया जाता है कि नहीं, मिट्टी, दंड, चक्र आदि उपकरण भी हों एवं घड़ा बनाने वाला कुम्भकार भी हो, तब घड़ा बनता है । किन्तु यदि अच्छे ढंग के घड़े के बनाने की योग्यता किसी कुम्हार में न हो तो भी घड़ा नहीं बन सकता । भावार्थ यह कि घड़ा बनाने की योग्यता भी होनी चाहिए । किन्तु फिर भी घड़ा न बनेगा क्योंकि योग्यता होते हुए भी यदि इच्छा न की जाय, संकल्प न किया जाय, चेष्टा न की जाय तब भी घड़ा न बन सकेगा । भावार्थ यह कि  घड़ा बनाने में मिट्टी आदि साधन भी अपेक्षित हैं, कुम्हार भी अपेक्षित है एवं घड़ा बनाने का ज्ञान, घड़ा बनाने की इच्छा, घड़ा बनाने का संकल्प एवं घड़ा बनाने की चेष्टा, ये सभी अपेक्षित हैं, अन्यथा एक छोटा सा घड़ा भी नहीं बन सकता । 

अब सोचिये की जब एक घड़े के बनाने के हेतु उपर्युक्त ६ कारणों की अपेक्षा है तब इतने विलक्षण विश्व के बनाने में इन कारणों की अपेक्षा क्यों न होगी । जब विश्व का चित्र भी बिना किसी चित्रकार के बनाये नहीं बन सकता और यदि कोई कहे कि यह विश्व का चित्र अपने आप बन गया तब बुद्धिमान् व्यक्ति उस वक्ता को पागल कहेगा, तब भला विश्व अपने आप कैसे बन सकता है? अतएव दर्शन-शास्त्र अनुमान-प्रमाण के द्वारा ईश्वर-सिद्धि करते हैं एवं सृष्टि का स्रष्टा ईश्वर को ही बताते हैं । आधुनिक भौतिक विज्ञान ने यहाँ तक सिद्ध किया है की परमाणु तो विद्युतकलास्वरूप हैं, स्थूल भौतिक पदार्थ नहीं हैं । साथ ही वे परमाणु किसी अव्यक्त, अज्ञात शक्ति की स्पंदन क्रियाएँ हैं । अब आप समझ गए होंगे कि भौतिक विज्ञान जिस तत्व को अज्ञात, अव्यक्त शब्द से पुकारता है, वह क्या हो सकता है? 
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)