प्रेम रस सिद्धांत (भाग 2)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 2) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
संक्षेपत: यों समझिये कि दुष्ट को तो पर-अपकार से क्षण-भंगुर सुख मिलता है, एतदर्थ वह वैसा कार्य करता है एवं संत और भगवान् को जो सदा सुखमय है, दूसरे को सुखी बनाने में सुख मिलता है, अतएव वे वैसा कार्य करते हैं । अब आप समझ गये होंगे कि इन तीनों का ही मुख्य प्रयोजन सुख-प्राप्ति ही है । अब सर्वसाधारण पर विचार कीजिए । विश्व का प्राणिमात्र एकमात्र आनन्द-प्राप्ति हेतु ही प्रत्येक कार्य करता है । यदि आप कहें कि धन-पुत्र-मित्रादि अन्य प्रयोजन के लिए भी, जो अनुभव सिद्ध हैं, कर्म किया जाता है तो यह समझ लेना चाहिये कि धन-पुत्रादि की प्राप्ति लक्ष्य नहीं है अपितु धन, पुत्रादि के द्वारा भी उसी अव्यक्त आनंद की प्राप्ति का ही लक्ष्य है -
सर्वेषामपि भूतानां नृपसवात्मैव वल्लभ: ।
इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि ॥ (भाग. 10-14-50)
इस वेदव्यासोक्ति का यही अभिप्राय है । यदि आप कहें कि जीवन, ज्ञान, स्वतन्त्रता, सब पर शासन करना तथा आनंद आदि पाँच लक्ष्य कुछ दार्शनिकों ने माने हैं, फिर एक ही लक्ष्य आनंद-प्राप्ति कैसे सिद्ध होगा, तो वहाँ भी यह समझ लेना चाहिए कि अन्य जीवन, ज्ञानादि लक्ष्य उसी आनन्द-प्राप्ति के हेतु ही होते हैं । अतएव सिद्ध हुआ कि विश्व का प्रत्येक जीव, वह चाहे सर्वसाधारण हो या दुष्ट हो या महापुरुष हो या भगवान् हो, एकमात्र आनंद के ही लक्ष्य से कार्य करता है । यह पृथक् बात है कि यदि आनन्द-प्राप्ति रूपी लक्ष्य का मार्ग सत्य है तो सत्यानन्द प्राप्त होगा, यदि मार्ग असत्य है तो असत्यानन्द अर्थात् दुःख ही प्राप्त होगा ।
अब इस एक आनन्दप्राप्ति के लक्ष्य पर गम्भीर विचार कीजिये, क्योंकि जब विश्व में सर्वत्र वैषम्य और वैमत्य है तो अल्पज्ञ से लेकर सर्वज्ञ तक, बिना किसी के सिखाये ही एकमात्र आनन्द ही क्यों चाहता है, इसका कोई महान् वैज्ञानिक रहस्य अवश्य होगा । हाँ, वह रहस्य यह है कि -
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्, आनंदाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दम् प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । (तैत्तिरियो. 3-6)
इस वेदोक्ति के अनुसार ब्रह्म आनन्दस्वरूप है । यहाँ तक कि -
आनन्द एवाधस्तात् आनन्द उपरिष्टात् आनन्द: पुरस्तात् आनंद: पश्चात् आनंद उत्तरत: आनंदो दक्षिणत: आनंद एवेदम् सर्वम् ।
के अनुसार उसके नीचे, उसके ऊपर, उसके पूर्व, उसके पश्चिम, उसके उत्तर, उसके दक्षिण, उसके बाहर, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द लबालब भरा है । आप कहेंगे कि यह तो आनन्दस्वरूप ईश्वर की बात हुई, पर यहाँ तो प्रश्न जीवों का है । पर बात यह है कि -
'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:' (गीता 15-7)
इस गीतोक्ति के अनुसार जीव उसी आनंदस्वरूप ब्रह्म का अंश है, अतएव अपने अंशी के स्वभाव से युक्त होने के कारण स्वभावत: प्रत्येक जीव एकमात्र आनन्द ही चाहता है । वस्तुतस्तु करोड़ों कल्प प्रयत्न करके भी कोई जीव आनंद-प्राप्ति रूपी लक्ष्य से च्युत नहीं हो सकता ।
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