प्रेम रस सिद्धान्त (भाग ५)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग ५) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय १ - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
वास्तव में आनन्द इस कारण नहीं प्राप्त हुआ क्योंकि अभी हम लोगों ने यही नहीं समझा एवं निश्चय किया कि आनन्द क्या है ? कहाँ है ? कैसे मिलेगा ?
वेद के अनुसार -
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य: | ( छान्दोग्यो. 7-23-1 )
अर्थात् आनन्द सदा अनन्तमात्रा का होता है । सीमित मात्रा का होता ही नहीं है क्योंकि आनन्द-प्राप्ति का अभिप्राय ही यह है कि उसके ऊपर फिर कभी भी दुःख का अधिकार न हो सके एवं उससे बड़ा कोई आनन्द न हो । जैसे प्रकाश पर अन्धकार का अधिकार नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक बार आनन्द प्राप्त होने पर पुन: दुःख का अधिकार नहीं हो सकता ।
अब यह विचार करना है कि ऐसा नित्य, असीम आनन्द कहाँ है? बस, यह प्रश्न ही बड़ा गम्भीर है । इसी के उत्तर में अनन्तानन्त वादों का विवाद अनादिकाल से चल रहा है, किन्तु आप घबड़ायें नहीं, अभी निश्चय हुआ जाता है ।
आनन्द-प्राप्त्यर्थ विश्व में जितने भी वादों के विवाद चल रहे हैं, उनको हम दो वादों में विभक्त कर सकते हैं, एक भौतिकवाद एवं दूसरा अध्यात्मवाद । यदि इन दोनों वादों को हम भलीभाँति समझ लें तो यह वाद-विवाद निर्विवाद रूप से हल हो जाय । सर्वप्रथम भौतिकवाद पर ही विचार कर डालिये ।
भौतिकवादियों का कहना है कि विश्व की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयादि सब कुछ प्राकृतिक नियमानुसार ही स्वयं होते रहते हैं, ईश्वर नाम का कोई तत्व नहीं है । ईश्वर तो बिगड़े गए दिमाग की उपज है । ईश्वर नाम के तत्व को इंसान ने बनाया है, ईश्वर ने इंसान को नहीं बनाया एवं उस ईश्वर को बीच में लाना पागलपन की पहचान है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु इन चार तत्वों से संसार बन गया है ।
उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति आनन्द चाहता है और आनन्द तभी प्राप्त हो सकता है जब जीव की प्रतिक्षण की वासनाओं की पूर्ति के हेतु उसके अभिलषित पदार्थ मिलते रहें । बिना इच्छाओं के अनुसार पदार्थ दिए आनन्द नहीं प्राप्त हो सकता, यह सब के अनुभव से स्वयं सिद्ध है ।
किन्तु भौतिकवादी यह नहीं सिद्ध कर पाते कि क्या वासनाओं के अनुसार अभिलषित पदार्थ पाने पर वासना की पूर्ति सदा के लिये हो जाती है अथवा पुन: वासना उत्पन्न होती है । यदि पुन: दुगुनी, चौगुनी वासना उत्पन्न होती है, तब तो जलती हुई आग में घी डालने के समान भोलापन सिद्ध होगा । यदि उनका यह अनुभव-सिद्ध प्रमाण है कि इच्छापूर्ति से सुख मिलता है, तो मेरा भी यह डंके की चोट पर अनुभव-सिद्ध प्रमाण है कि वासना-पूर्ति के पश्चात् क्षणभंगुर सुख ही मिलता है एवं कुछ क्षण के पश्चात् ही बलवती वासना की पुन: उत्पत्ति होती है । इस प्रकार पदार्थों के प्रदान करने पर वासनाओं की पूर्ति की कहीं भी सीमा नहीं है । क्या भौतिकवादियों के इतिहास में एक भी व्यक्ति ने ऐसा कहा है कि अमुक व्यक्ति को अमुक मात्रा का पदार्थ मिला था एवं उसने अपना अनुभव बताया था कि मैं पूर्णकाम बन गया हूँ ? यह असंभव है । यह तो प्रतिक्षण वर्द्धमान रोग है ।
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