प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 3)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 3)- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

कुछ दार्शनिक इसी आनन्द-प्राप्ति के लक्ष्य को आत्यंतिक दुःखनिवृत्ति रूप में प्रतिपादित करते हैं । यथा, सांख्य कहता है - दुःखत्रयाभिघातात् जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ अर्थात् दुःखनिवृत्ति ही जीव का चरम लक्ष्य है । वह दुःख तीन प्रकार का होता है -

१. आध्यात्मिक (दैहिक) २. आधिभौतिक ३. आधिदैविक 

१. आध्यात्मिक अथवा दैहिक दुःख दो प्रकार का होता है -

प्रथम शारीरिक ज्वरातिसारादि  रोगों से उत्पन्न दुःख एवं द्वितीय मानसिक काम, क्रोध, लोभादि से उत्पन्न दुःख । 

२. आधिभौतिक - मनुष्य, पशु एवं स्थावरादि से उत्पन्न दुःख । 

३. आधिदैविक - शीतोष्ण वर्षादि से उत्पन्न दुःख । 

पुन: सांख्य दर्शन कहता है -

कुत्रापि कोऽपि सुखी तदपि दुःखशबलमिति दुःख पक्षे नि:क्षिपन्ते विवेचका: ।

अर्थात् संसार में सुख नहीं है । यदि कोई कहीं सुखी दिखाई भी पड़ता है तो वह भी भ्रान्ति मात्र है, क्योंकि सांसारिक सुख अनित्य, सीमित एवं परिणामी होता है । 

इस प्रकार दुःखनिवृत्ति का लक्ष्य भी दूसरे शब्दों में आनन्द-प्राप्ति का ही द्योतक है । इतना ही नहीं, विश्व का प्रत्येक जीव ईश्वरीय सम्पत्तियों से भी बिना किसी के सिखाये पढ़ाये स्वभावत: प्रेम करता है, यथा सत्य, अहिंसा, अक्रोध, क्षमा आदि । आप कहेंगे कि विश्व में इने-गिने जीवों अर्थात् महापुरुषों को छोड़कर कौन ऐसा है जो सत्य, अहिंसा आदि से प्रेम करता हो ? पर ऐसा कहना भोलापन है । करोड़ों कल्प प्रयत्न करके भी कोई मूर्ख से मूर्ख जीव भी सत्यादि के विरुद्ध असत्य, चोरी, दुराचारादि  से प्रेम नहीं कर सकता । इसे यों समझिए - जैसे यदि कोई चोर यह कहे कि मैं चोरी को अच्छा मानता हूँ तो उसकी कोई प्रिय वस्तु चुरा लीजिये । फिर देखिये उसे एतराज़ होता है या नहीं । यदि होता है तो क्यों? जब उसका सिद्धांत चोरी करना है तो उसकी चोरी होने पर उसे दुःख क्यों होता है ? यदि मिथ्याभाषी से कोई झूठ बोलता है तो उसे कष्ट क्यों होता है? यदि किसी परपीड़नशील को कोई पीड़ित करता है तो उसे कष्ट क्यों होता है ? इससे सिद्ध हुआ की प्रत्येक जीव ईश्वरीय संपत्ति से भी प्रेम करता है और इसका भी प्रमुख विज्ञान वही है कि जीव उसी ईश्वर का अंश है, अतएव यह उसका स्वाभाविक स्वभाव है कि वह ईश्वरीय सम्पत्तियों से भी प्रेम करे । 

अत: यह भी सिद्ध हुआ कि जीव परमानन्द प्राप्ति के साथ-साथ परमानन्द-प्राप्ति के गुणों को भी लक्ष्य बनाये हुए है । यह सब स्वाभाविक रूप से ही है । 
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)