प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 4)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 4) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

अब यह विचार करना है कि क्या कोई ऐसा भी जीव हो सकता है कि जो न दुःख चाहे न सुख अर्थात् कुछ क्रिया ही न करे? ऐसा असम्भव है । गीता के अनुसार -

न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ( गीता 3-5 )

अर्थात् कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नहीं रह सकता । आनन्द प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण कर्म करना यह जीव का स्वभाव है । साथ ही यह स्वभावसिद्ध क्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक वह वास्तविक परमानन्द न प्राप्त कर लेगा । 

इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि विश्व का प्रत्येक जीव एकमात्र आनन्द ही चाहता है एवं उसी आनन्द की प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण प्रयत्नशील भी है । अब यह विचार करना है कि यह प्रयत्न कब से चल रहा है । 

वेदों के अनुसार - 

ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । 
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदाविन्दते ब्रह्ममेतत् ॥  ( श्वेता. 1-9 )

अर्थात् प्रत्येक जीव अज है । उसका प्रारम्भ कभी नहीं हुआ । 

'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' ( गीता 15-7)

इस गीतोक्ति के अनुसार भी जीव सनातन है । भावार्थ यह है कि यदि आप से कोई पूछे कि आप कब से हैं तो सीधा सा उत्तर है कि जब से भगवान् हैं । यदि वह फिर पूछे कि आपके भगवान् कब से हैं, तो सीधा उत्तर है कि जब से हम हैं । यदि वह पुन: पूछे कि आप एवं भगवान् कब से हैं, तो स्पष्ट उत्तर है कि जब से 'कब' भी नहीं था, तब से हैं । अर्थात् 'कब' यानी काल तो हमारे एवं भगवान् के पश्चात् ही उत्पन्न हुआ अतएव वह काल हम लोगों का निश्चय नहीं कर सकता, अत: हम सब अनादि हैं । एक बात और भी विचारणीय है कि  -

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: । 
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥  ( गीता 2-16 )

इस गीतोक्ति के अनुसार किसी सत्ता का अभाव नहीं हो सकता, अर्थात् यदि हम आज हैं तो पहले भी सदा से थे । यदि आज न होते तो पहले भी कभी न होते । इसलिए भी हम सब - 

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय: । 
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ ( गीता 2-20 )

इस गीतोक्ति के अनुसार हम नित्य हैं, शाश्वत एवं अजन्मा हैं । 

अब यह सिद्ध हो गया कि लोग अनादिकाल से अर्थात् अनंतकाल से उसी परमानन्द-प्राप्ति के हेतु प्रतिक्षण प्रयत्नशील हैं । किन्तु आश्चर्य है कि अनन्तानन्त जन्मों से अनवरत प्रयत्न करने के पश्चात् भी अद्यावधि आनन्द नहीं प्राप्त हुआ । इसका प्रमुख रहस्य क्या है ?
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