प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 7)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 7) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
अतएव केवल भौतिकवाद के उत्थानमात्र से अन्तरंग की सुख-शान्ति की समस्या नहीं हल हो सकती । जैसे सर्वसाधन-सम्पन्न महल में एक पागल व्यक्ति खड़ा कर दिया जाए तो वह भौतिकवाद एवं वादी दोनों का सत्यानाश कर देगा । वैसे ही यदि अन्त:करण के विचार शुद्ध न होंगे तो भौतिकवाद उल्टे सर्वनाश में ही समर्थ होगा । सुख-शान्ति तो अन्तरंग ही होती है, अत: वह कैसे प्राप्त होगी । अतएव वासनाओं के अनुसार पदार्थ देकर उसे पूरा करने का लक्ष्य सर्वथा गलत है । इतना अवश्य है कि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के हेतु भौतिकवाद सर्वथा ग्राह्य है । अब अध्यात्मवाद पर विचार कीजिये ।
वेद कहता है -
रसो वै स:, रसह्येवायंलब्ध्वाऽऽनन्दी भवति (तैत्तिरियो 2-7)
अर्थात् ईश्वर ही आनन्द है, उसे ही प्राप्त करके जीव आनन्दमय हो सकता है ।
'तमेव विदित्वातिमृत्युमेतु नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय' (श्वेता 3-8, 6-15)
अर्थात् उसको जानकर ही दुःखार्णव से जीव उत्तीर्ण हो सकता है, अन्य कोई मार्ग नहीं है । किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या ईश्वर नाम का कोई तत्त्व है ? और यदि है तो क्या वेदादि में लिखा है इसलिए उसे मान लिया जाय या कोई ठोस प्रमाण है ? प्रत्यक्षवादी तो कहते हैं कि हम बिना किसी तत्त्व को प्रत्यक्ष किये नहीं मानते क्योंकि हम अन्धविश्वासी नहीं हैं । अत: अब ईश्वरवादी एवं प्रत्यक्षवादी के मध्य एक विषम समस्या आ गयी, उसे निबटाना है ।
ज़रा प्रत्यक्षवादी महोदय से पूछिये कि आपने अपने आपको देखा है ? उत्तर मिलेगा "नहीं", क्योंकि जीवात्मा तो सूक्ष्म है उसका साक्षात्कार महात्माओं को ही हो सकता है । तो फिर क्या प्रत्यक्षवादी अपने आपको क्या मानता है ? पुन: प्रत्यक्षवादी से पूछिये की आपने अपनी बुद्धि, अपने मन आदि को देखा है ? उत्तर मिलेगा - "नहीं", क्योंकि सूक्ष्म मन-बुद्धि का भी साक्षात्कार सर्वसाधारण को असंभव है । अच्छा, प्रत्यक्षवादी महोदय, आप केवल 'प' अक्षर का ज्ञान ही प्रत्यक्षवाद से प्राप्त कर लीजिये । यह भी असम्भव है, क्योंकि अक्षरों का उच्चारण एवं पहचान शब्द प्रमाण माने बिना असंभव है । भावार्थ यह कि प्रत्यक्षवादी अपने प्रत्यक्षवाद से एक अक्षर का भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता । अच्छा, तुम अपने प्रत्यक्षवाद से अपने बाप को सिद्ध कर सकते हो? उत्तर मिलेगा "नहीं", क्योंकि तब तो हम नहीं थे । तो तुम अपने आपको, अपने बाप को एवं अपने मन बुद्धि आदि को भी सिद्ध नहीं कर सकते तो तुम कैसे प्रत्यक्षवादी हो? अच्छा, चक्षुरिन्द्रिय से अणु इन्द्रिय-शक्ति को देख सकते हो? "नहीं" । तो तुम प्रत्यक्षवाद से कैसे सब कुछ सिद्ध करना चाहते हो ? अच्छा, तुमने जब सर्वप्रथम किसी देश या वस्तु को देखा था तो उसके पूर्व तो उसका प्रत्यक्ष नहीं था, फिर तुमने उसे मानकर कैसे तदर्थ प्रयत्न किया था? अच्छा, तुम खाना खाते हो, पानी पीते हो, वायु सेवन करते हो, तो सब को पहले विज्ञान से परीक्षण करके तब सेवन करते हो क्या? सारे राष्ट्रों का संचालन क्या प्रत्यक्षवाद से हो सकता है? क्या तुम किसी बात को बिना प्रत्यक्ष किये नहीं मानते ? यदि ऐसा है तब तो मेरी राय से सर्वप्रथम तुम्हें मस्तिष्क का इलाज कराना पड़ेगा पश्चात् प्रत्यक्षवादी या कोई अन्य वाद-वादी बन सकते हो ।
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