प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 6)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 6) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

जिस प्रकार खाज को खुजलाने से वर्तमानकाल में सुखानुभूति तो होती है किन्तु पुन: उसका भयंकर स्वरूप हो जाता है, उसी प्रकार अभिलषित पदार्थों के देने से, क्षणभंगुर वासना की पूर्ति से, आनन्द तो मिलता है किन्तु वह आनन्द सीमित होता है । कुछ क्षण के पश्चात् ही दूसरी वासना का विराट् स्वरूप समक्ष आ जाता है । वास्तव में सांसारिक पदार्थों द्वारा इच्छापूर्ति होने पर लोभ उत्पन्न होता है -

'ज्यों प्रतिलाभ लोभ अधिकाई'

एवं उसकी अपूर्ति होने पर क्रोध होता है । अतएव वासना के उत्पन्न होते ही दुःख स्वयं साकार होकर आ जाता है । उससे कोई भी भौतिकवादी नहीं बच सकता । 

वेदव्यास जी कहते हैं कि -

यत्पृथिव्यां व्रीहि यवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: । 
नालमेकस्य पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ॥   ( भा॰ 9-19-13 )

अर्थात् यदि विश्व के समस्त पदार्थ एक व्यक्ति को सहज में प्राप्त हो जायें तो भी वासनाओं का रोग उत्तरोत्तर बढ़ता ही जायगा, पुन: साधारण सामग्री से वासनापूर्ति का लक्ष्य बनाना कितना हास्यास्पद है । 

भौतिकवादी कहते हैं कि देखो हमने अपने भौतिकवाद की कितनी उन्नति की है । हमारे लिए जल, थल, नभ सर्वत्र मार्ग खुल गया है, हम जहाँ चाहें, जायें । हमने बड़े बड़े हाइड्रोजन बम आदि बना लिए हैं । अनेक असाध्य कहलाने वाले लक्ष्यों को सुख-साध्य बना लिया है । पहले लोग जंगली थे, अब परम सभ्य बन गए हैं । पहले लोग शरीर के रोग से अधिक दुःखी थे, अब रोगों पर कन्ट्रोल हो गया है इत्यादि । उपर्युक्त बातें अक्षरशः सत्य है । हम उसके आगे और भी मानने को तैयार हैं । किन्तु भौतिकवादी क्या मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं कि उपर्युक्त समस्त उन्नतियों के परिणामस्वरूप अंतरंग सुख-शान्ति की झांकी की झलक भी क्या प्राप्त हुई ? क्या सत्य, अहिंसा, मानवता आदि में उन्नति हुई है ? क्या एक व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक में कहीं अंतरंग शान्ति की झलक भी दिखाई पड़ी है ? यदि नहीं तो उपर्युक्त वस्तु की उन्नति धोखा नहीं तो क्या है ? वर्तमान भौतिकवाद की वस्तु सम्बन्धी उन्नति से सुख-शान्ति की कितनी अवनति हुई है, यह सर्वानुभूत विषय है । आज तक एक भी विशेषज्ञ यह कहने को तैयार नहीं है कि कल विश्व भौतिकवाद की उन्नति का ग्रास न बन जाएगा । जब भौतिकवाद की उन्नति का यह परिणाम है कि वह भौतिकवादी को ही भक्षण करना चाहता है तो फिर सुख-शान्ति का स्वप्न तो करोड़ों कोस दूर की बात है । 

भावार्थ यह है कि भौतिकवाद की उन्नति से अंतःकरण की शुद्धि सर्वथा असंभव है और उसके बिना सुख-शान्ति की आशा करना नितान्त पागलपन है । 
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)