प्रेम रस सिद्धांत (भाग 1)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 1) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

विश्व का प्रत्येक जीव बिना किसी प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता, यह एक अनुभवसिद्ध सिद्धांत है । दर्शनशास्त्र कहता है, 'प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि  न प्रवर्तते' अर्थात् घोर से घोर मूर्ख भी बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता । अतएव प्रत्येक कार्य का पृथक्-पृथक् प्रयोजन होना भी स्वाभाविक होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है । कार्य अनंत होते हुए भी प्रयोजन एक ही है । सुनने में यह बात विचित्र सी है किन्तु विचार करने पर साधारण एवं स्वाभाविक है । 

कुछ लोग कह सकते हैं कि बिना प्रयोजन के भी तो कार्य हैं; यथा -

खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । 
जे बिनु काज दाहिने बाँये । 

अर्थात् दुष्ट बिना प्रयोजन के पर-अपकारी होते हैं । इसी प्रकार -

पर उपकार बचन मन काया । सन्त  सहज सुभाव  खगराया ॥ 
भूर्ज तरू सम सन्त कृपाला । परहित सह नित विपति विसाला ॥ 

अर्थात् महापुरुष बिना प्रयोजन के परोपकार करता है एवं इसी प्रकार महापुरुषों के आराध्य परात्पर सर्वशक्तिमान भगवान् भी बिना प्रयोजन के ही परोपकार करते हैं । इस प्रकार दुष्ट, सन्त एवं भगवान्  तीनों ही बिना प्रयोजन कार्य करते हैं । तब उपर्युक्त सिद्धांत तो इसी से खण्डित हो जाता है । किन्तु ऐसी बात नहीं है । इन तीनों का भी कुछ न कुछ प्रयोजन अवश्य है । 

यथा - 

'जो काहू की देखहिं विपती, सुखी होहिं मानहु जग नृपति'

अर्थात् दूसरे को दुःखी देखकर दुष्ट को सुख मिलता है यही उसका गुप्त प्रयोजन है । इसी प्रकार महापुरुष एवं भगवान् भी -

'पर दुख दुख, सुख सुख देखे पर'

अर्थात् दूसरे  के दुःख को देखकर दुःखी होते हैं एवं दूसरे के सुख को देखकर सुखी होते हैं । अस्तु सुखी बनने के लिए परोपकार रूपी  कार्य करते हैं । इस प्रकार पर-अपकार रूपी कार्य से दुष्ट को एवं परोपकार रूपी कार्य से संत, भगवान् को सुख मिलता है । इस प्रकार सुख-प्राप्ति-रूपी प्रयोजन सिद्ध हुआ ।
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