प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 8)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 8) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

अच्छा, यह बताओ कि शब्द का प्रत्यक्ष आँख से कर सकते हो ? यदि नहीं तो क्यों ? इसलिए कि शब्द आँख का विषय नहीं है । अच्छा, जब कान का विषय आँख से हल नहीं हो सकता तो इन्द्रियों से परे मन का विषय किसी इन्द्रिय से कैसे हल होगा ?  एवं मन से परे बुद्धि का विषय मन से कैसे हल होगा? एवं बुद्धि से परे विषय बुद्धि से कैसे हल होगा? 

ईश्वर यद्यपि अनुमान का भी विषय नहीं है, फिर भी किसी सीमा तक अनुमान से समझा जा सकता है, यथा -

(1) संसार का व्यवस्थित रूप देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है की ऐसे सुव्यवस्था किसी शासन से ही संभव है और वह शासन सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही हो सकता है, क्योंकि मनुष्य तो उसकी व्यवस्था को समझने में भी असमर्थ पाया जा रहा है । 

(2) सूर्यचन्द्रादि लोकों का निर्माण विशिष्ट विज्ञानी भी नहीं कर सकता । निर्माण तो दूर की बात है, उसकी तह का भी परिज्ञान दुःसंभव हो रहा है । 

(3) सूर्यचन्द्रादि नियमित रूप से नियम में आबद्ध है, इसका नियन्ता अवश्य कोई सर्व-समर्थ ईश्वर है । 

(4) पृथ्वी आदि का धारण करने से प्रयत्नवान् ईश्वर सिद्ध होता है । 

(5) नियम का निर्माता अवश्य होगा । एवं उसका प्रयोग करने वाला भी कोई सर्वज्ञ ईश्वर होगा । 

विश्व में कोई भी कार्य तभी संभव होता है जब उसके उपकरण, कर्त्ता, ज्ञान, इच्छा, कृति, चेष्टा, क्रिया आदि सब संयुक्त होते हैं । इतने विलक्षण जगत् निर्माण में भी उपर्युक्त सभी  साधनों की आवश्यकता है और वह ईश्वर से ही संभव है । यदि कोई कहे कि हमारी प्रकृति में ही हम उपर्युक्त समस्त शक्तियों को मानते हैं तब तो उसका 'नेचर' (nature) शब्द ईश्वर का पर्यायवाची ही सिद्ध हुआ । फिर तो कोई विवाद नहीं है । हम लोग जौसे 'कृष्णाय नमः' 'वासुदेवाय नम:' कहा करते हैं वैसे ही 'नेचराय नम:' कहा करेंगे । हमारे ईश्वर के तो 'अनन्तनामरूपाय' के अनुसार असंख्य नाम हैं एवं असंख्य रूप हैं । किन्तु यदि प्रकृति जड़ है तो उसमें सृष्टि  करने की शक्ति नहीं हो सकती । अत: सृष्टि आदि के लिए ईश्वर को मानना ही पड़ेगा ।
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