प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 10)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 10) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1- जीव का चरम लक्ष्य 🌿

हमारा वेद भी ईश्वर को - 

अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् ॥ (वेद)

अर्थात् अज्ञात, अव्यक्त ही कहता है । प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो॰ एडिंटन कहता है कि कोई अज्ञात, अव्यक्त कारण ही किसी अज्ञात क्रिया में काम कर रहा है किन्तु हम उसके विषय में कुछ नहीं जानते । किसी-किसी ऐसे अज्ञात मूलतत्त्व का सामना करना पड़ता है जो भौतिक जगत् से अतीत है । अब आप सोचें कि भौतिकवाद कितना अपूर्ण एवं खोखला है । उस अज्ञात तत्त्व को अज्ञात शब्द से पुकारने मात्र से खोज समाप्त नहीं मानी जाती । उस अज्ञात तत्त्व की खोज करनी होगी । तब विज्ञान 'विज्ञान' कहलायेगा अन्यथा तो वह अज्ञान ही रहेगा । 

कुछ भौतिकवादी कहते हैं की परमाणुओं से ही सृष्टि होती है, ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं । वे लोग गम्भीरता से सोचें कि संयोग तो प्रदेश वाले पदार्थों का ही होता है, निरवयव, निष्प्रदेश परमाणुओं का परस्पर संबंध कैसे होगा एवं बिना उनके परस्पर संयोग से सृष्टि कैसे होगी? यदि यह भी मान लिया जाय कि परमाणुओं का संयोग हो जाता है, यह नियम विपरीत बात भी हो जाती है, तो भी एक गम्भीर समस्या समक्ष आती है वह यह कि एक सेकेण्ड में एक लाख मील भागने वाले परमाणु अपना ज्ञान दूसरे परमाणु में कैसे डाल सकते हैं और फिर चैतन्य कैसे स्थिर रह सकता है, जब कि ५० वर्ष की पढ़ी हुई चीज़ बुद्धिमान कहलाने वाले मनुष्य को भूल जाती है । यदि यह भी मान लिया जाय तो भी एक गंभीर समस्या सामने आती है, वह यह कि परमाणुओं का प्रवृत्ति स्वभाव माना जाय या निवृत्ति स्वभाव माना जाय, या दोनों ही स्वभाव माने जायें या दोनों ही न माने जायें । यदि प्रवृत्ति स्वभाव माना जाय तब तो सृष्टि हो जायेगी पर प्रलय कैसे होगा ? जबकि क्लासियस के ताप सिद्धांत के द्वारा एवं आज के वैज्ञानिकों के सिद्धांत द्वारा भी यह निर्विवाद सिद्ध है कि एक दिन प्रलय हो जायगा, पृथ्वी ठंडी पड़ जायगी, सब जीव समाप्त हो जायेंगे । 

यदि परमाणुओं का निवृत्ति स्वभाव माना जाय तब प्रलय तो सिद्ध हो जायगा किन्तु प्रमुख प्रश्न तो यह है कि वर्तमान सृष्टि कैसे हुई अर्थात् सृष्टि का प्रश्न कैसे हल होगा । यदि परमाणुओं का स्वभाव दोनों ही माना जाय तो विरोधी स्वभाव होने के कारण न सृष्टि होगी न प्रलय । यदि परमाणुओं का दोनों ही स्वभाव न माना जाय तो ईश्वर की आवश्यकता स्वभावत:सिद्ध है क्योंकि उन परमाणुओं को कंट्रोल करने वाला ईश्वर अवश्य है । 
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