प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 20)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 20) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

यदि कोई कहे कि ठीक है, ईश्वर होगा, किन्तु उसकी उपासना आदि करने से क्या अभिप्राय है । जैसे अपने देश में कोई अध्यक्ष होता है उसी प्रकार ईश्वर भी सम्पूर्ण विश्व का अध्यक्ष होगा । किन्तु यह बात नहीं है । क्योंकि देश के अध्यक्ष से हमारे नाते सीमित ही हैं और उस ईश्वर से हमारे नाते पूर्ण हैं । पुन: हम स्वार्थी हैं, हमारा स्वार्थ जहाँ भी सिद्ध होगा वहीं हमारा स्वाभाविक प्रेम हो जायगा, यह अनुभूत बात है । हम वास्तविक नित्य असीम आनन्द चाहते हैं और ऐसा आनन्द एकमात्र ईश्वर में ही है । अतएव ईश्वर से हमारा घनिष्टतम सम्बन्ध है । यदि हमें आनन्द की प्राप्ति अन्यत्र कुत्रापि हो सकती तो ईश्वर से हमारा सम्बन्ध देश के अध्यक्ष के समान ही रहता । आप ईश्वर की प्राप्ति के विषय में चिन्तित न हों, वह सर्व-सुलभ है । मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि उसकी प्राप्ति में कोई साधना ही नहीं करनी है । आप कहेंगे यदि साधना नहीं करनी है तो अब तक आनन्द-प्राप्ति क्यों नहीं हुई । हाँ, यह प्रश्न ठीक है । यही सब तो समझना है । थोड़ा धैर्य रखिये सब समझ में आ जायगा । अब ईश्वर के स्वरूप पर विचार करना है । क्योंकि वेद के अनुसार -

इह चेदशकद्बोद्धुं, प्राक्शरीरस्य विस्रस: । 
तत: सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥  (कठो. 2-3-4)

अर्थात् मानवदेह पाकर यदि ईश्वर को नहीं जाना तो पुन: चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाना होगा । उससे बड़ी कोई भूल न होगी । अतएव मानव देह का महत्त्व समझकर ईश्वर को समझना है जिससे हम अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें ।
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अध्याय 1 सम्पूर्ण 
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