प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 19)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 19) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
इसके अतिरिक्त कर्म जड़ हैं, वे स्वयं फल नहीं बन सकते । उनको ठीक समय में फल रूप में देने का काम सर्वज्ञ ईश्वर ही कर सकता है । जीव प्रथम तो अल्पज्ञ है, उसे अनन्त जन्मों के अपने कर्मों का ज्ञान नहीं है । दूसरे यदि हो भी जाय तो अपने विरुद्ध कौन कर्मफल भोगना चाहेगा ? अतएव ईश्वर को कर्मफल-दाता मानना पड़ेगा । ऐसा न्यायदर्शन का भी मत है ।
वस्तुतस्तु ईश्वर की सिद्धि प्रत्यक्ष एवं अनुमान इन दोनों ही प्रमाणों से पूर्णतया नहीं हो सकती । अतएव वेदान्त ने शब्द-प्रमाण से ही ईश्वर को सिद्ध किया है । प्राय: भोले लोग कहते हैं कि शब्द-प्रमाण तो साधारण प्रमाण है, अनुभव-प्रमाण ही सत्य है । किन्तु उन्हें यह जानना चाहिये कि अनुभव तो साधना के पश्चात् ही होता है । शब्द को साधना के पूर्व मानना ही पड़ेगा । पुन: यदि अनुभव-प्रमाण माना जाय तब तो संसार का भी कार्य असिद्ध हो जायगा । यथा एक पित्त-रोगी मीठी चीनी को कड़वी अनुभव करता है । एक पीलिया का रोगी श्वेत वस्तु को पीली देखता है । सर्प का काटा हुआ व्यक्ति कड़वी नीम को मीठी अनुभव करता है । चींटी नमक के डले को मुँह में रखकर चीनी के पहाड़ पर भी चक्कर लगाकर उस पहाड़ को नमकीन ही अनुभव करती है, भावार्थ यह कि अनुभव यदि उस कक्षा का न हुआ तो धोखा हो सकता है । अतएव शब्द-प्रमाण के द्वारा ही अनुभव करने पर वास्तविक तत्व का साक्षात्कार हो सकता है ।
यदि शास्त्रों-वेदों के अनुसार ईश्वर-प्राप्ति की साधना करने पर ईश्वर-सिद्धि न हो तभी यह कहने का अधिकार है कि ईश्वर नहीं है । भौतिक जगत की सिद्धि के हेतु प्रथम साधना ही की जाती है अन्यथा वैज्ञानिक क्यों साधना करें । जितना अनुभव है उसके आगे न मानें । पर ऐसा नहीं है, वे कहते हैं कई साधना के पश्चात् ही किसी तत्त्व को सिद्ध अथवा असिद्ध किया जा सकता है, प्रथम तो मानना ही पड़ेगा ।
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