प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 28)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 28) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 3 - भगवत्कृपा🌿
(1) सर्व प्रथम यह विचार कीजिये कि ईश्वर सर्वज्ञ है या अल्पज्ञ है । वेद ने कहा है -
य: सर्वज्ञ: सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप: (मुण्डको. 1-1-9)
अर्थात् ईश्वर सर्वज्ञ है । अब यह सोचिये कि यदि ईश्वर सर्वज्ञ है और वही हमारा संचालक है अर्थात् वही हमारे प्रत्येक कार्य का कर्त्ता है तो हमारे द्वारा अल्पज्ञता के कार्य क्यों होते हैं ?
(2) यह सोचिये कि यदि ईश्वर कर्त्ता है तो हम अपने आप को कर्त्ता क्यों महसूस करते हैं, फिर तो हमें अशान्त न होना चाहिए ?
(3) यदि ईश्वर कर्त्ता है तो वही भोक्ता होना चाहिए या अपने आपको उसे क्षमा कर देना चाहिए किन्तु हमें तो भोक्ता न बनना चाहिए । यह तो साधारण मनुष्य भी न करेगा कि कार्य स्वयं करे एवं फल दूसरा भोगे । देवदत्त खाना खाय एवं विष्णुदत्त का पेट भरे या देवदत्त खाना खाय, विष्णुदत्त उल्टी करे, यह कैसे होगा ?
(4) यदि ईश्वर कर्त्ता है तो उसने अपना विधान, अर्थात् वेदों में जीवों के लिए कार्याकार्य का विधान निर्माण क्यों किया, फिर तो वह कह देता कि जीवों को कुछ नहीं करना है, मैं जैसा चाहूँगा, कराऊँगा ?
(5) यदि ईश्वर कर्त्ता समदर्शी है तो एक तो प्रह्लाद आदि का परम पद देकर सदा के लिए आनन्दमय कर दिया एवं दूसरे को काम, क्रोध, लोभादि के पिटारे में बंद करके वासनाओं की दासता भोगवा रहा है, ऐसा अन्याय कैसे हो सकता है ? पुनश्च 84 लाख योनियों का विधि-निर्माण ही क्यों करता ?
(6) यदि कहो कि यह तो ईश्वर का अभिनय मात्र है, सुख, दुःख जीव को मिलता ही नहीं है, तब तो हमें ब्रह्म-ज्ञानादि की आवश्यकता ही नहीं है ।
उपर्युक्त दोषारोपण के परिणामस्वरूप यह निश्चय हुआ कि यदि हम ईश्वर को कर्त्ता मानते हैं तो ईश्वर कोई आततायी तत्त्व सिद्ध होगा एवं साथ ही हमारी उच्छृङ्खलता उत्तरतोत्तर बढ़ती जायगी; हम आलसी बनते जायेंगे एवं हमारी प्रत्येक क्रिया पैशाचिक होने लग जायगी । ऐसे ही हम पर्याप्त उच्छृङ्खल हैं फिर ईश्वर को कर्त्ता मानना तो महान् पतनकारक है ।
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
Comments
Post a Comment