प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 22)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 22) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 2 - ईश्वर का स्वरूप🌿
तीसरा कारण यह है कि -
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । (श्वेता. 6-14)
अर्थात् वह प्रकाशक है । उससे इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्रकाशित होते हैं । अतएव प्रकाशक ईश्वर से प्रकाशित इन्द्रिय, मन, बुद्धि अपने प्रकाशक की प्रकाशिका कैसे हो सकती हैं? अतएव वह सर्वथा अज्ञेय है ।
चौथा कारण -
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेवं ब्रह्मं त्वं विद्धिं नेदं यदिदमुपासते ॥ (केनो. 1-5)
अर्थात् उसकी प्रेरणा से इन्द्रिय, मन, बुद्धि अपना-अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं अतएव प्रेर्य इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्रेरक ईश्वर को ग्रहण करने में असमर्थ हैं ।
इसके अतिरिक्त ईश्वर दो विरोधी धर्मों का अधिष्ठान है ।
अणोरणीयान् महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तो:।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ (श्वेता. 3-20)
अर्थात् आप जितनी छोटी कल्पना परमाणु आदि की कर सकते हैं ईश्वर उससे भी छोटा है एवं आप जितनी बड़ी कल्पना आकाशादि की कर सकते हों, ईश्वर उससे भी बड़ा है । छोटे से छोटा होना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि उसे छोटी से छोटी वस्तु में भी व्याप्त होना है और बड़े से बड़ा होना इसलिए आवश्यक है कि सबको अपने भीतर स्थिर रखना है एवं प्रलय द्वारा अपने में प्रविष्ट कराना है । यदि इतना ही होता कि वह छोटा होता तो समझ में आता, यदि बड़ा होता तो समझ में आता । संभव है दोनों स्थितियाँ भी समझ में आ जातीं किन्तु वेद कहता है कि -
'नेति नेत्यस्थूलमनणु:'
अर्थात् न वह छोटा है और न बड़ा है । तब फिर उसे कैसे समझा जाय ।
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