प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 11)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 11) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
एक दार्शनिक सिद्धान्त यह भी सर्वमान्य है, उस पर भी गम्भीर विचार अपेक्षित है । वह यह कि रूपवान् कार्य का कारण सूक्ष्म एवं नित्य होता है और कार्य उससे अधिक स्थूल और अनित्य होता है । जैसे वस्त्र को ही ले लीजिये । वह सूत की अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य है । इस नियमानुसार यदि परमाणु रूपवान् हैं तब उनका भी कोई कारण होगा जो और सूक्ष्म एवं नित्य होगा । बस वही तो ईश्वर है ।
एक प्रश्न और भी विचारणीय है कि उन परमाणुओं में गंधादि गुण मानने पड़ेंगे अन्यथा उन परमाणुओं से बनी हुई पृथ्वी आदि में गंधादि गुण कहाँ से आयेंगे । अब यह विचार कीजिये कि क्या सब परमाणुओं में एक ही गुण है ? यदि एक ही गुण मानें तो गंध-रसादि की उत्पत्ति कैसे होगी? यदि सब परमाणुओं में समता मानें तो जल में भी गंध होगी एवं तेज में भी गंध-रसादि होंगे, यहाँ तक वायु में भी रस-गंधादि होने लग जायेंगे ।
भावार्थ यह है कि परमाणुओं के संयोग से सृष्टि मानना भोलापन है । कुछ लोग कहते हैं कि घडी अपने आप चलती है ऐसे ही सृष्टि भी अपने आप हो जायगी, किन्तु उन्हें सोचना चाहिए कि घडी पूर्व में नहीं चलती थी जब किसी ने उसे बनाया तब चलने लगी एवं पश्चात् भी नहीं चलेगी अर्थात् नष्ट हो जायगी, तब फिर बनानी पड़ेगी । इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि घड़ी बनाने वाले ने घड़ी तो बनायी है किन्तु उस घड़ी के लौह परमाणुओं की क्रिया को घड़ी साज नहीं जानता अर्थात् उस पर कन्ट्रोल नहीं कर सकता । उसे कन्ट्रोल करने वाला ईश्वर है । अतएव ईश्वर को सर्वव्यापक होना पड़ता है अन्यथा वे परमाणु ठीक रूप से काम नहीं कर सकते ।
ईस्वी सन् से 500 वर्ष पूर्व यूनान में कुछ दार्शनिक हुए है, जिन्होंने सृष्टि का कारण प्रकट किया है । थैलीज़ ने कहा कि सृष्टि का आदि कारण जल है । एनेक्सीमैंडर ने कहा पृथ्वी, जल आदि कारण नहीं हैं अपितु कोई अनियत द्रव्य है जिससे पृथ्वी, जल आदि का सृजन होता है ।
एनेक्सीमैनीज़ ने कहा यह भी ठीक नहीं है । सृष्टि का मूल तत्त्व वायु है । वायु से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है । एनेक्सीगोरस ने कहा यह भी ठीक नहीं है । वस्तुत: अनेक तत्त्वों के मिश्रण एवं ईश्वरेच्छा से सृष्टि हुई है । पीथोगोरस ने कहा, एक संख्या से अनेक की उत्पत्ति हुई है ।
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