प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 27)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 27) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 3 - भगवत्कृपा🌿
माया-निवृत्ति के सम्बन्ध में भी रामायण का मत है कि -
सो दासी रघुबीर की समझे मिथ्या सोपि ।
छुटै न राम कृपा बिनु नाथ कहौं पद रोपि ॥
भ्रम-निवृत्ति के विषय में भी रामायण ने बताया है कि -
रजत सीप महँ भास जिमि, यथा भानु कर वारि ।
यदपि मृषा तिहुँ काल महँ, भ्रम न सकै कोउ टारि ॥
जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सो कृपालु रघुराई ॥
मानस-रोग निवृत्ति के लिए भी -
राम कृपा नासहिं सब रोगा ।
सत्संग के लिए भी रामायण ने बताया कि -
बिनु सत्संग विवेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोइ॥
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता । बिनु हरी कृपा मिलहिं नहिं सन्ता ॥
सन्त विशुद्ध मिलहिं पुनि तेही । राम कृपा करि चितवहिं जेही ॥
भावार्थ यह कि वेद से लेकर रामायणपर्यन्त सर्व-सम्मति से यह निश्चित हुआ कि ईश्वर कृपा के बिना हमारी आत्यन्तिक-दुःख-निवृत्ति भी नहीं हो सकती एवं परमानन्द-प्राप्ति भी नहीं हो सकती ।
अब विचार यह करना है कि जब ईश्वर कृपा से ही सब कुछ होना है तो हम लोगों की छुट्टी है । जब वह कृपा करेगा तब सब काम स्वयमेव ठीक हो जायगा । साधनादि का परिश्रम व्यर्थ ही है । एवं इसी आशय से विश्व के अधिकांश प्रिय महानुभाव यह कह दिया करते हैं कि उस ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता । उसकी इच्छा बिना पत्ता नहीं हिल सकता, उसे जैसा करना होता है, करता है । अतएव हम से यदि कोई अनाचार, दुराचार, पापाचार आदि भी होता है तो वही जिम्मेदार है, हम तो निर्दोष हैं ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ।
ईश्वर: सर्वभूतानां हृदेशोऽर्जुन तिष्ठति ॥ (गीता 18-61)
उमा दारु जोषित की नाईं । सबहिं नचावत राम गुसाईं ॥
आदि के अनुसार हम एक यन्त्रारूढ़ कीट के समान हैं, वह जैसा करता है वैसा ही हम करते जाते हैं । यह सिद्धान्त महान् सर्वनाश करने वाला भी है एवं महान् उत्थान करने वाला भी है, अतएव इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा ।
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