प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 14)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 14) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
अब थोड़ा पृथ्वी की आयु पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार सुन लीजिये । प्रथम रसायन शास्त्री लोग सृष्टि के मूल तत्व 92 मानते थे, अब एक ही मानते हैं । हेकल आदि डार्विन के अनुयायियों का कहना था कि संसार को बने 8 लाख 20 हज़ार वर्ष हुए हैं जब कि भूगर्भ-शास्त्री कहते हैं कि 10 करोड़ वर्ष हुए । प्रो॰ पेरी ने रेडियम की खोज द्वारा यह बताया है कि पृथ्वी की आयु 10 करोड़ वर्ष से भी अधिक है । अब सोचिये इसमें क्या सही है ? और यदि हम प्रत्यक्षवाद से सिद्ध करें तो आप चकित रह जायेंगे । अभी कुछ दिन पूर्व नेवाडा में मिस्टर जान टी. रोड ने खुदाई में एक जूते की आयु 60 लाख वर्ष घोषित की है जिसकी सिलाई बहुत अच्छी है अर्थात् 60 लाख वर्ष पूर्व मनुष्य पूर्ण विकसित था । अब सोचिये उस पूर्ण विकास में भी तो कम से कम 50 लाख वर्ष लगे होंगे ।
भावार्थ यह है कि इस प्रकार उस जूते के सिद्धन्तानुसार एक करोड़ वर्ष के मनुष्य हुए । विकासवादियों, हेकल आदि के मतानुसार अमीबा से 22 कड़ी बाद मनुष्य बना अर्थात् यदि 1 कड़ी में 1 करोड़ वर्ष भी मान लें तो 21 करोड़ वर्ष अमीबा को हुए हुआ होगा । करोड़ों वर्ष बाद अमीबा हुआ होगा । इस प्रकार 22 करोड़ वर्ष तो कम से कम हुए जब कि हेकल 8 लाख 20 हज़ार वर्ष बताता है । यह सब तीर-तुक्का है । वस्तुत: शास्त्रीय दृष्टि से संसार 1 अरब 95 करोड़ कुछ लाख वर्ष का है । 14 मनु की आयु में 4 अरब 32 करोड़ वर्ष होते हैं । ब्रह्मा की आयु 50 वर्ष की बीत चुकी है, 50 बाकी हैं । यदि किसी एक कुएं में बैलगाड़ी, मोटर, रॉकेट, आदि दाल दिए जाएं तो जब कभी पृथ्वी से वे खोदे जायेंगे तब किस उन्नति का अनुमान किया जायगा?
आज का वैज्ञानिक सिद्धान्त ही डार्विन, हेकल आदि की मखौल उडाता है और कहता है बंदर से मनुष्य नहीं उत्पन्न हुए अपितु मनुष्य से बंदर उत्पन्न हुए हैं । प्राचीनकाल में मनुष्य ने विज्ञान में बहुत उन्नति की इसलिए दिमाग कमज़ोर हो गया । अतएव वे जंगली बनमानुष, बन्दर आदि बन गये । ध्यान देने की बात है कि अब पुन: विज्ञान की अंतिम सीमा आ गयी है, अतएव विज्ञानी लोग सावधान हो जायें, उन्हें बनमानुष एवं बन्दर बनना पड़ेगा ।
कहाँ तक कहें, स्वयं डार्विन के पुत्र जॉर्ज डार्विन ने 16 अगस्त, 1905 में कहा था कि जीवन एवं सृष्टि का रहस्य अब भी उतना ही गुप्त है, जितना पहले था।
मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि किसी भी जीवन-कार्य की संगति भौतिकवाद से नहीं हो पा रही है । यहाँ तक कि आँसू तक को सिद्ध नहीं कर पाये । कुछ वर्ष पूर्व इंग्लैंड की विज्ञान सभा में डाक्टर ला की बात दुहराई गयी कि आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी खोज यही है कि अभी तक कुछ नहीं खोज पाये अर्थात् मूलतत्त्व नहीं समझ पाये ।
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
Comments
Post a Comment