प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 18)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 18) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ।   (छान्दोग्यो. 3-14-1)

'ईशावास्यमिदम् सर्वम्'   (ईशावास्यो. 1)

'सियाराममय सब जग जानी' 

'प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना ।'

यह सब सत्य होने पर भी सदोष इन्द्रिय, मन, बुद्धि का अनुभव गलत होना स्वाभाविक है । विवेकानन्द, तुलसी, सूर, मीरा आदि का पीलिया रोग अच्छा हो गया था । अस्तु, उन्हें सर्वत्र ब्रह्म के आनन्दमय स्वरूप का अनुभव हो रहा था, किन्तु जब उन्होंने अपना सत्य अनुभव हमें बताया तो हमने उनको नहीं माना और उनकी खिल्ली उड़ाई । 

भगवान् दो विरोधी धर्मों का अधिष्ठान है इसलिए उसे समझने में कठिनाई होती है । किन्तु उसे प्राप्त किया जा सकता है और यह वही कर सकता है जिस पर उसकी कृपा हो जाय । उसकी कृपा से ही प्राकृत इन्द्रिय, मन, बुद्धि को दिव्यता प्राप्त हो जाती है जिससे दिव्य ईश्वर ग्राह्य हो जाता है । 
विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक ही है । वह करोड़ों कल्प परिश्रम करके भी नास्तिक नहीं बन सकता क्योंकि प्रत्येक अनीश्वरवादी आनन्द को तो मानता ही है और आनन्द ईश्वर का पर्यायवाची है । अतएव आनन्दोपासक स्वयं ही ईश्वरोपासक सिद्ध हो जाता है । उसका ईश्वरीय गुणों में प्रेम भी ईश्वर को सिद्ध करता है । यहाँ तक कि उसका स्वयं सत्ता ही ईश्वर को सिद्ध करती है । 

वाल्मीकि के कथनानुसार -

लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रत: । 

अर्थात् विश्व में एक भी जीव ऐसा नहीं जो राम का अनुयायी न हो । यह पृथक् बात है कि हम उसकी प्राप्ति का ठीक मार्ग न जानते हों अतएव प्रयत्न विपरीत हो रहा हो, किन्तु ईश्वर को तो मानते ही हैं ।

यदि कोई कहे कि मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं ईश्वर का विरोध करूँगा तब तो वह प्रकांड आस्तिक है । जैसे हमारे यहाँ हिरण्यकशिपु आदि हुए । वे प्रकांड आस्तिक इसलिए हैं कि विरोध तो किसी सत्ता से ही हो सकता है । यदि ईश्वर न होता तो वे विरोध किससे करते । पुन: यह भी इतिहास-सिद्ध बात है कि इन राक्षसों को ईश्वर-प्राप्ति भी हुई । क्योंकि उपासना का अभिप्राय यह है कि किसी भी भाव से मन को ईश्वर में एक कर देना । वह चाहे अनुकूल भाव से हो अथवा प्रतिकूल भाव से हो -  

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहार्दमेव च ।
नित्यं हरौ विद्धतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥  (भाग.10-29-15)

इस वेदव्यासोक्ति के अनुसार काम से, क्रोध से, भय से, स्नेह से, सौहार्द से, ऐक्य से, जैसे कैसे भी ईश्वर में मन एक कर देने से ईश्वर की ही प्राप्ति होगी । फिर वह प्रकांड आस्तिक यानी मायातीत महापुरुष स्वयं सिद्ध है । उसे नास्तिक कहना स्वयं की नास्तिकता का द्योतक है ।
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