प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 30)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 30) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 3 - भगवत्कृपा🌿
कुछ लोग काल को दोष देकर उच्छृङ्खल हो जाते हैं । उनका कहना है कि समय सब करा लेता है । कुछ लोग परिस्थिति की ओट लेकर कि परिस्थिति से मनुष्य पापकर्मादि करता है, ऐसा कह कर पापाचार में प्रवृत्त होते हैं । किन्तु यह सब अपनी नासमझी का परिणाम है । वस्तुत: ईश्वर, भाग्य, कालादि का कोई दोष नहीं है । हम आपको एक आश्चर्य बतायें, कतिपय देशों में परिस्थिति वश पाप करने का सिद्धान्त है जिन्हें हम प्रकांड नास्तिक मतावलम्बी कहते हैं, कुछ देश इश्वरेच्छावादी हैं जिन्हें हम प्रकांड आस्तिक देश कहते हैं । किन्तु न तो उस नास्तिक देश में और न इस आस्तिक देश के इतिहास में ही कभी ऐसा हुआ कि लोगों को अपराध का दण्ड न दिया जाये, जबकि नास्तिक के मत से परिस्थिति ही दोषी है एवं आस्तिक के मत से ईश्वरेच्छा ही दोषी है । भावार्थ यह कि अपने दोषों को छिपाने एवं बढ़ाने के दृष्टिकोण से ही कतिपय भोले लोगों ने वास्तविक सिद्धान्त का अनर्थ किया है । वस्तुत: व्यक्ति ही कार्याकार्य का जिम्मेदार है । तुलसीदास जी कहते हैं कि -
नर तनु भाव वारिधि कहँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥
कर्णधार सद्गुरु दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥
जो न तरइ भवसागर, नर समाज अस पाइ ।
सो कृतनिन्दक मन्द मति, आतम हाँ गति जाइ ॥
सो परत्र दुःख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताय ।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय ॥
अर्थात् वह आत्मा का हनन करने वाला है जो काल, कर्म, ईश्वर को दोषी ठहरा कर मनमाना पाप करता है । उसे इस लोक में भी सुख-शान्ति नहीं मिल सकती एवं परलोकादि के सुखों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । अतएव सिद्ध हुआ कि ईश्वर-कृपा की ओट में अकर्मण्य बने रहना, यह सर्वाधिक सर्वनाश का मार्ग होगा । अतएव यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ईश्वर-कृपा भी किसी आधार पर आधारित है । वह किसी कारण की अपेक्षा रखती है, बस कारण जो भी हो । जिसने उस कारण की पूर्ति कर दी उस पर ईश्वर की कृपा हो गयी और वह कृतार्थ हो गया । वे ही सन्त महात्मा हैं ।
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अध्याय 3 सम्पूर्ण
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