प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 26)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 26) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 3 - भगवत्कृपा🌿

वेद ने बताया कि -

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।  
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूम् स्वाम् ॥  (कठो. 1-2-23) 

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमात्मन: । (कठो. 1-2-20)

अर्थात् उसे उच्चतम इन्द्रिय,मन, बुद्धि भी यद्यपि नहीं ग्रहण कर सकते किन्तु वह जिस पर कृपा कर देता है एवं कृपा द्वारा अपनी दिव्य शक्ति प्रदान कर देता है वह बड़भागी जीव उस अज्ञेय ईश्वर को पूर्णतया जान लेता है एवं उस अदृष्ट ईश्वर का पूर्णतया दर्शन कर लेता है । इसी आशय से गीता कहती है -

तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् । (गीता 18-62) 

अर्थात् अर्जुन! तुम ईश्वर की कृपा से परमशान्ति एवं उसके शाश्वतानन्दमय दिव्यधाम को प्राप्त कर सकते हो । इसके अतिरिक्त जब अर्जुन को पूर्णज्ञान हो गया एवं ज्ञान का अत्यन्ताभाव हो गया तब भी उसने यही कहा था कि - 
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । (गीता 18-73)

अर्थात् आपकी कृपा से ज्ञान हुआ एवं अज्ञान सदा के लिए समाप्त हो गया । यह ध्यान रहे कि ज्ञान पर अज्ञान का अधिकार कभी नहीं हो सकता, जैसे प्रकाश पर अन्धकार का अधिकार असम्भव  है । अब पुराणों में आइये । वेदव्यासजी कहते हैं - 

अथापि ते देव पदाम्बुजद्वयप्रसादलेशानुगृहीत एव हि । 
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् (भाग. 10-14-29)

अर्थात् उस ईश्वर को युगों तक परिश्रम करके भी कोई नहीं जान सकता किन्तु उस ईश्वर की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है एवं कृतार्थ हो जाता है । रामायण भी यही कहती है कि - 

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाइ॥ 

तुम्हरिहिं कृपा तुमहिं रघुनन्दन । जानत भगत भगत उर चन्दन ॥ 

राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥  
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