प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 21)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 21) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 2 -  ईश्वर का स्वरूप🌿

'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्' अर्थात् जो वेद नहीं जानता वह ईश्वर को नहीं जान सकता । अत: सर्वप्रथम वेदों में ही चल कर देखा जाय । वेद कहता है -

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद स: । 
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥  (केनो. 2-3)

अर्थात् जो यह समझता है कि ईश्वर समझने का विषय है वह नहीं समझता एवं जो यह समझता है कि ईश्वर समझने का विषय नहीं है वह ईश्वर को समझता है । अर्थात् ईश्वर को कोई नहीं समझ सकता । दूसरी ओर वेद यह भी कहता है -

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि: ।  (केनो. 2-5)

अर्थात् यदि इसी मानव-देह में ईश्वर को जान लिया, तब तो ठीक है अन्यथा महती हानि हो जायगी क्योंकि यह मानवदेह देवताओं को भी अप्राप्य है । 

वेदों ने ईश्वर न जान सकने के कई कारण बताये हैं । एक कारण तो यह कि -

इन्द्रियेभ्य: परा ह्यार्था अर्थेभ्यश्च परं मन: । 
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् पर: ॥ 
महत: परमव्यक्तात् पुरुष: पर: । 
पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गति: ॥   (कठो. 1-3-10, 11)

अर्थात् इन्द्रियों से परे इन्द्रियों के विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन  से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे जीव है,जीव से परे माया है, माया से परे ब्रह्म है । भावार्थ यह कि इन्द्रिय, मन और बुद्धि से ईश्वर सर्वथा परे है, अतएव इन्द्रिय, मन, बुद्धि से ग्राह्य नहीं हो सकता, जब कि जीव के पास यही एकमात्र साधन है । 

दूसरा कारण यह है कि 'दिव्योह्यमूर्त: पुरुष:' अर्थात् ईश्वर दिव्य है एवं इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्राकृत हैं । अतएव इन्द्रिय, मन, बुद्धि दिव्य ईश्वर को नहीं ग्रहण कर सकते ।
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