प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 16)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 16) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿
स्पेन्सर, हेमिल्टन आदि का तर्क है - यदि ईश्वर संसार से बाहर है तो स्वतन्त्र हो सकता है । किन्तु तब उन्हें संसार का ज्ञान कैसे होगा ? और यदि वह संसार में कार्य करता है तो अनंत अचिन्त्य शक्तिमान् भगवान् को सीमित शक्ति में उतारना भोलापन है । और फिर सबसे प्रमुख बात तो यह है कि बिना ईश्वर के व्याप्त हुए अचेतन प्रकृति में नियमित एवं ज्ञानपूर्वक विकास असम्भव है ।
कुछ लोग कहते हैं कि अचेतन तृण से दूध एवं दूध से दही आदि बन जाता है, इस प्रकार बिना ज्ञानादि शक्ति के सृष्टि हो जाती है । किन्तु यह तर्क भी भोलेपन का है क्योंकि यदि तृण से दूध बन जाता तो बैल तो तृण खाता है उससे दूध क्यों नहीं बनता? इसके अतिरिक्त तृण खाने वाली गाय चैतन्य होती है । अपने आप कभी तृण दूध बना है ?
कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर एवं प्रकृति मिल कर सृष्टि करते हैं, ऐसा मान लिया जाय । किन्तु ऐसा मानने में ईश्वर अपूर्ण एवं सदोष सिद्ध होगा । सांख्य दर्शन का सिद्धान्त तो अकर्ता एवं अप्राकृत सिद्ध करने मात्र का है ।
कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर तो चैतन्य है फिर उससे जड़ विश्व कैसे बन सकता है । किन्तु उन्हें जानना चाहिये कि चैतन्य मनुष्य से ही बाल एवं नखादि कैसे होते हैं । पुन: मायाधीश ईश्वर के लिए क्या कठिन है ।
कुछ लोग कहते हैं कि समन्वय कर दिया जाय अर्थात् चेतन का रचयिता चेतन ईश्वर एवं जड़ का कारण प्रकृति मान ली जाय । किन्तु ऐसा मानने पर चेतन विकारी सिद्ध होगा ।
कुछ लोग कहते हैं कि काल को सृष्टिकर्ता मान लिया जाय, ईश्वर की क्या आवश्यकता है ? यह प्रश्न भी बड़ा व्यापक है, किन्तु ध्यान रखना चाहिये कि काल की उत्पत्ति तो ईश्वर से ही होती है -
अक्षरात् संजायते काल: | ( वेद )
पुनश्च गीता कहती है -
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ ( गीता 15-16 )
कुछ लोग कहते हैं कि कर्म को सृष्टि का कारण मान लेना चाहिए किन्तु यह तो सर्वथा असम्भव है क्योंकि कर्म जड़ है तथा चित् के अधीन भी है । कुछ लोग कहते हैं कि जीव को सृष्टिकर्ता मान लेना चाहिये । किन्तु यह भी असम्भव है क्योंकि जीव अल्पज्ञ है, साथ ही पराधीन है । यदि जीव स्वाधीन होता तो स्वयं कर्म फल को क्यों भोगना चाहता ?
कुछ लोग अन्त में कहते हैं कि जीवनमुक्त परमहंस जो 'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति' के अनुसार ब्रह्म हो जाते हैं, उनसे सृष्टि मान ली जाय, किन्तु वेदान्त कहता है 'जगद्व्यापारवर्जम्' ( ब्र. सू. 4-4-17 ) - संसार आदि बनाने का कार्य परमहंस भी नहीं कर सकते । उनकी ब्रह्म से एकता तो केवल 'भोगमात्रसाम्यलिंगाच्च' ( ब्र. सू. 4-4-21 ) के अनुसार ब्रह्मानन्द भोगने के दृष्टिकोण से ही मानी गयी है ।
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