प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 23)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 23) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 2 - ईश्वर का स्वरूप🌿
५. पुनश्च-
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ (कठो. 1-2-14)
अर्थात् ईश्वर धर्म से परे है, अधर्म से परे है, कार्य से परे है एवं कारण से भी परे है ।
६. पुनश्च -
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं सुहृत ॥ (श्वेता. 3-17)
ईश्वर समस्त इन्द्रियों आदि से रहित है, किन्तु समस्त इन्द्रियादिकों के विषय को ग्रहण करता है । यहाँ तक कि -
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण: ।
सा वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम् ॥ (श्वेता. 3-19)
अर्थात् उसके पैर नहीं हैं किन्तु दौड़ता है, उसके हाथ नहीं हैं किन्तु पकड़ता है, उसके आँख नहीं हैं किन्तु देखता है, उसके कान नहीं हैं किन्तु सुनता है, वह सब कुछ जानता है, उसे कोई नहीं जानता ।
दूसरी ओर -
सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्रपात् ।
स भूमिम् विश्वतोवृत्वात्यतिष्ठाद्दशांगुलम् ॥ (पुरुष सूक्त-1)
अर्थात् उसके अनन्त सिर हैं, अनन्त आँखें हैं, अनन्त पैर हैं, आदि । अस्तु, अगर बिना पैर का होता तो हम उसे लँगड़ा समझ लेते किन्तु दौड़ता है तब लँगड़ा कैसे समझ लेंगे । इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों की समस्या है ।
८. पुनश्च
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत: ॥ (ईशावास्योप. 5)
अर्थात् वह चलता है, वह नहीं चलता है, वह दूर से भी दूर है एवं वह समीप से भी समीप है; वह सब के भीतर है एवं सब के बाहर है ।
९. पुनश्च -
अजायमानो बहुधा विजायते, तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरा:। (यजुर्वेद)
अर्थात् वह अजन्मा भी है एवं अनन्तानन्त जन्म भी धारण करता है ।
✨✨✨✨✨✨✨✨✨
Comments
Post a Comment