प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 13)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 13) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

पुन: देखिये क्रमिक विकास का खोखला तर्क । स्याही के दस स्तन होते हैं, उससे उन्नत होकर चुहिया बनी उसके आठ ही स्तन रह गये । पुन: उन्नत होकर बिल्ली बनी तो 6 स्तन ही रह गये । पुन: उन्नत होकर गाय भैंस बनी उसके चार ही स्तन रह गये । सबसे उन्नत मनुष्य के दो ही रह गये । क्या बढ़िया विकास है !

और भी देखिये । गाय-भैंस आदि के बाल आजन्म एक रंग के होते हैं किन्तु मनुष्य के बाल लड़कपन में सुनहरे रंग के, युवावस्था में काले रंग के, वृध्दावस्था में सफ़ेद रंग के, अति-वृद्धावस्था में पिंगल रंग के हो जाते हैं । पुन: पशु को तैरने आदि की स्वाभाविक योग्यता होती है किन्तु उससे विकसित मनुष्य को यह सब सीखना पड़ता है । और देखिये, पशु आड़े शरीर के होते हैं, वृक्ष उल्टे शरीर के होते हैं, मनुष्य सीधे शरीर के होते हैं । यह कौन सा क्रमिक विकास है ? वृक्ष दूषित खुराक, गन्दी चीज़ें ग्रहण करते हैं एवं उससे पुष्ट होते हैं किन्तु अच्छी वायु फेंकते हैं, अच्छे फल फूल आदि देते हैं । विकास में विपरीत हो गया कि मनुष्य अच्छी खुराक, अच्छी वायु आदि से पुष्ट होते हैं किन्तु गन्दी वायु आदि फेंकते हैं । 

पुन: आयु का क्रमिक विकास देखिये । कछुए की आयु 150 वर्ष, सर्प की 120 वर्ष, उससे विकास होने पर कबूतर की आयु 8 वर्ष की रह गयी । एक हँसी की बात और सुनिये कि 80 मन की छिपकली मानी गयी है, उसकी हड्डी लन्दन के म्यूज़ियम में रखी है । जबकि अस्थिपंजर 80 मन का है तो उसका वजन 200 मन होगा । जब छिपकली 200 मन की है तब मनुष्य को कम से कम 8000 मन का होना चाहिए । दूसरी बात यह कि डार्विन के मत में पेड़ इतने बड़े माने गये हैं कि जंगल के जलने पर कोयले की खान बन गयी तब तो आदमी को 50 मंज़िलें मकान से भी बड़ा होना चाहिये ।
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