प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 17)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 17) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 1 - जीव का चरम लक्ष्य 🌿

भावार्थ यह कि सृष्टिकर्ता ईश्वर को मानना ही होगा । यह तर्क, शास्त्र एवं युक्ति सभी से सिद्ध है । किन्तु वेदान्त-शास्त्र कहता है कि यद्यपि तर्क से तुम लोग सिद्ध करते हो किन्तु ईश्वर-सिद्धि तर्क का विषय नहीं है । वेद में लिखा है इसलिए ईश्वर को मान लेना चाहिये । जिसे न मानना हो या शंका हो वह वेद के अनुसार साधना करके देख ले । यदि ईश्वर-प्राप्ति न हो तभी उसे यह कहने का अधिकार है कि ईश्वर नहीं है । अस्तु, यह ईश्वर की सिद्धि हुई । 

यहाँ पर प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि यदि भगवान् सर्वव्यापक है तो फिर उसका हमें अनुभव क्यों नहीं होता । रसगुल्ला खाते हैं, चीनी खाते हैं तो हमें उसकी मिठास का अनुभव होता है फिर प्रत्येक परमाणु में व्याप्त आनन्दमय भगवान् के आनन्द का हमें अनुभव क्यों नहीं होता? दूध पीने में दूध का अनुभव होता है, विष खाने में विष का अनुभव होता है, उसी प्रकार भगवान् का भी अनुभव हमें होना चाहिये । आप लोगों का दावा है कि अनुभव में आने वाली वस्तु ही आप मान सकते हैं । अनुभव प्रमाण ही आपको मान्य है । किन्तु अनुभव प्रमाण सबसे निर्बल प्रमाण है । पीलिया रोग के रोगी को सर्वत्र पीला ही पीला दीखता है किन्तु उसका अनुभव भ्रामक है । साँप के काटे हुए व्यक्ति को नीम मीठा लगता है । इसी प्रकार भव-रोग से ग्रस्त जीव का अनुभव भ्रामक ही होता है । एक चींटी चीनी के पहाड़ पर चक्कर काटकर लौटी और उससे पूछा गया तो उसने अनुभव यह बताया कि यह पर्वत नमकीन था । बड़ा आश्चर्य हुआ किन्तु जब जाँच हुई तो पता चला कि चींटी के मुख में नमक की डली रखी हुई थी । अस्तु, सर्वत्र शक्कर के ढेर पर भ्रमण करते हुए भी उसे अपने मुख में रखे हुए नमक का ही स्वाद अनुभव में आया । उसी प्रकार जिस इन्द्रिय, मन, बुद्धि से हम संसार को ग्रहण करते हैं वे सब प्राकृत, मायिक, त्रिगुणात्मक एवं सदोष हैं और भगवान् प्रकृत्यतीत, दिव्य, गुणातीत एवं दोषरहित हैं, फिर हम इनसे उसके ठीक स्वरूप को किस प्रकार से पहचान सकते हैं ? जब तक ये दिव्य न हो जायें, इनका अनुभव सही कदापि नहीं हो सकता । 
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