प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 29)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 29) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 3 - भगवत्कृपा🌿
कुछ लोग कहते हैं ईश्वर निर्दोष है, वह कर्त्ता नहीं है, किन्तु हमारे भाग्य का ही दोष है । जैसा भाग्य में लिखा है, ईश्वर वैसा ही कराता है । अतएव इसलिए भी हम निर्दोष हैं -
हरिणापि हरेणापि ब्रह्मणापि सुरैरपि ।
ललाटलिखिता रेखा परिमार्ष्टुम् न शक्यते ॥ (सूक्ति)
किन्तु ऐसे भाग्यवादी सर्वप्रथम विचार करें कि भाग्य क्या तत्त्व है । वे कहेंगे 'पूर्वजन्मकृतं कर्म तद्दैवमिति कथ्यते' अर्थात् पूर्व जन्मों के किये गए पुरुषार्थ पश्चात् जन्म में भाग्य कहलाते हैं । भावार्थ भूतकाल के कर्म भविष्य काल में भाग्य की संज्ञा पा जाते हैं । इसका अभिप्राय यह हुआ कि हमने भूतकाल में पुरुषार्थ किया है । भूतकाल में हम पुरुषार्थ करने में स्वतन्त्र थे, केवल वर्तमान में ही ईश्वर का नियम बदल गया कि हम पुरुषार्थ नहीं कर सकते ? क्या हँसी की बात है ! हमारा पिछला जन्म भी तो उस समय वर्तमान ही था । तब भी हमें यही कहना चाहिये था कि वर्तमान में कर्म नहीं कर सकते और यदि सदा यही कहना चाहिये था तो किस भूतकाल में कर्म किया जिसका फल अनंत भविष्य काल तक भोगना पड़ रहा है ? यदि भूतकाल में कर्म किया है तो आज भी कर सकते हैं, यदि आज नहीं कर सकते तो भूत में भी न किया होगा, यह तो साधारण बुद्धि वाला भी समझ सकता है । अतएव भाग्य के नाम पर उच्छृङ्खलता करना और भी नासमझी है । वेद-शास्त्र या लोक भी यह नहीं कहता कि तुम्हें कुछ नहीं करना है, बस भाग्य के अनुसार सब होता जायगा । हम सांसारिक कार्यों में न ईश्वर को कर्त्ता मान कर अकर्मण्य बनते हैं और न भाग्य को समक्ष रख कर आलसी ही बनते हैं । वहाँ तो धन, पुत्रादि के हेतु प्रतिक्षण द्रुतगति से प्रयत्नशील हैं, किन्तु ईश्वर-प्राप्ति के विषय में यह सिद्धान्त मान लिया जाता है कि हमें कुछ करना नहीं है ।
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