प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 31)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 31) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 4 -  शरणागति🌿

पुन: वेदों में चलिये । वेद कहता है -

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तम् ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं ममुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥  (श्वेता. 6-18)

तपः प्रभावाद् देवप्रसादाच्च   (श्वेता. 6-21)

अर्थात् हम उस परमेश्वर की शरण में हैं, जिसकी कृपा से आत्मा एवं बुद्धि में प्रकाश प्राप्त होता है, जो ब्रह्मा आदि का सृष्टिकर्ता है । भावार्थ यह कि शरणागति से ही उसकी कृपा हो सकती है । गीता कहती है -

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ (गीता 18-62)

अर्थात् हे अर्जुन ! तू उसी ईश्वर की शरण में जा तब उसकी कृपा होगी, तब तू मेरा परमधाम एवं परम शान्ति प्राप्त कर सकेगा, क्योंकि -

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥  (गीता 7-14)

अर्थात् मेरी दैवी त्रिगुणात्मिका माया को वही पार कर सकता है जो केवल मेरी शरण में आता है । वेदव्यास कहते हैं कि -

तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम् ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च ||   (भाग. 11-12-14)

मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्  । 
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभय: ||   (भाग. 11-12-15)

अर्थात् हे उद्धव ! तू अनेक प्रकार के त्रिगुणात्मक कर्म प्रपंच को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा क्योंकि सभी आत्माओं का परम आत्मा मैं हूँ । तभी तू निर्भय होकर मायातीत हो सकता है ।
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