प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 54)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 54) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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अब आपको ईश्वरीय क्षेत्र का वास्तविक 'अच्छा' बनना है, जिसके पश्चात् पुन: बुरा बनने की नौबत न आए । ऐसे 'अच्छे' के विरोधी सात्त्विक, राजस, तामस, तीन प्रकार के लोग हैं । तो फिर आप कैसे आशा करते हैं कि स्वाभाविक विरोधी गुण वाले आपके अनुकूल रहेंगे ? यदि आप सात्त्विक बनेंगे तो आपको राजस, तामस एवं ईश्वरीय लोग बुरा कहेंगे । यदि तामस बनते हैं तो राजस, सात्त्विक, ईश्वरीय बुरा कहेंगे । जब तीन पार्टी विरोधी हैं ही तो ईश्वरीय अच्छा क्यों न बन जाय, जिससे सदा के लिए अच्छे ही बन जायें यानी आनन्दमय हो जायें? संसार तो अपना कार्य स्वाभाविक गुणों के आधीन होने के कारण करेगा ही, उसकी चिन्ता हम क्यों करें? इसे इस कथानक से समझिये ।
एक बार शंकरजी एवं पार्वतीजी दोनों नादिया के साथ संसार में भ्रमण करने निकले । संसारियों ने उनकी प्रत्येक स्थिति में आलोचना की । जब शंकरजी नादिया पर थे एवं पार्वतीजी पैदल थीं, तब शंकरजी की आलोचना हुई । जब पार्वतीजी नादिया पर चढ़ीं तो उनकी आलोचना हुई । जब दोनों चढ़ें तो दोनों की क्रूरता की निन्दा हुई । जब दोनों पैदल चले तो मूर्ख कहे गये । जब दोनों ने नादिया को टाँग लिया तो महामूर्ख कहे गये ।
भावार्थ यह कि संसार को उपर्युक्त प्रकार से परस्पर विरोधी समझकर अच्छा कहलाने में समय एवं आत्मशक्ति का अपव्यय न करें, अपितु सत्यमार्ग का अवलम्बन करें । संसार को मिटाना भी हमारे हाथ में नहीं है, अतएव, हमें अपने अन्तरंग संसार को मिटाकर अपना लक्ष्य प्राप्त करना है ।
एक आश्चर्य की बात सुनिये । मैं आपसे यह कहूँ कि आप संसार के सबसे बड़े मूर्ख को ले आइये । मान लीजिये, आप लाये । मैं उसे एक सप्ताह कोठरी में बंद रखूँ, खाना न दूँ, पानी न दूँ । वह एक सप्ताह बाद कितना भूखा होगा यह आप नहीं सोच सकते । खैर, ऐसे भूखे घोर मूर्ख को सात दिन बाद स्वर्ण की थाली में बड़े आदर के साथ अनेक मेवा-मिष्ठान दिये जायें तो वह कितना खुश होगा ! किन्तु, यदि उसी के किसी विश्वासपात्र को रुपया आदि देकर, उससे उस मूर्ख के कान में यह कहलवा दिया जाय कि इस खाने में विष मिला है, इसे न खाना, तो वह तुरन्त खाना छोड़ देगा । आप उससे प्रश्न कीजिये - 'तुम खाना क्यों नहीं खाते?' वह कहेगा, 'इसमें विष मिला है, विष मारक होता है और हमें मरना नहीं है ।' पुन: उससे पूछिये, 'तुमने क्या कभी विष का अनुभव किया है?' वह कहेगा, 'यह भी कोई प्रश्न है? यदि विष का अनुभव किया होता तो मर गये होते ।' तीसरा प्रश्न कीजिये -'तुमने विष नामक वस्तु को कभी देखा है ?' वह कहेगा, 'नहीं । मैं क्यों देखूँ जिसे आत्महत्या करनी हो या दूसरे की हत्या करनी हो या डाक्टर आदि अन्य लोग देखें ।' चौथा प्रश्न कीजिये - 'तुमने इस खाने में कुछ मिलाते देखा है' ? वह कहेगा, 'नहीं मैंने तो नहीं देखा, किन्तु मेरा मित्र कह रहा था ।'
अब विचार कीजिये कि सात दिन का भूखा मूर्ख विष के अनुभव के बिना ही एवं विष को न देखे हुए ही अपने मित्र की बात मानकर विश्वाश कर लेता है और वह हज़ारों रुपये देने पर भी खाना नहीं खाता, किन्तु आप लोग संसार के विषय विष का अनुभव करते हुए भी एवं देखते, पहिचानते हुए भी, बुद्धिमान् कहलाने वाले भी, उससे विरक्त नहीं होते । अब आप लोग सोच लीजिये कि आप कितने समझदार हैं । अतएव हमें संसार के स्वरूप पर गंभीरता पूर्वक विचार करना है । यह कोई ग्रंथ की बात नहीं, अपितु दैनिक अनुभव की बात है, जिसे स्वीकार करने में किसी को संकोच न होगा ।
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