प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 53)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 53) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
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अब आप समझ गये होंगे कि संसार स्वार्थ-सिद्धि का रंग मंच है । यहाँ सब खिलाड़ी अपनी अपनी बुद्धि के बल से खेल रहे हैं किन्तु जब तक वास्तविक स्वार्थ समझ में न आवे, अर्थात् जब तक यह निश्चय न हो कि संसार को त्यागना है और संसार को त्यागने का अभिप्राय यह है कि संसार से न राग हो न द्वेष तथा ईश्वर से ही प्रेम हो, तभी स्वार्थ-सिद्धि हो सकती है, तब तक हमारा काम नहीं बन सकता । क्योंकि -

वारि मथे बरु होइ घृत सिकता से बरु तेल । 
बिनु हरि भजन न भव तरिय यह सिद्धान्त अपेल ॥ (रामायण)

जिस जल में घी नहीं हैं, जिस रेत में तेल नहीं, उसमें परिश्रम का फल परिश्रम ही रहेगा । परन्तु इस संसार में सुख ढूंढने का परिणाम तो और भी भयंकर होगा क्योंकि कर्मबन्धनों से बँधते जाओगे जिसका अन्त नहीं है । 

अतएव संसार में किसी को न अपना समझो, न पराया । यह संसार तो ईश्वर प्राप्ति-रूपी लक्ष्य की पूर्ति के लिये घूम रहा है । किन्तु, यदि किसी जानकार ने यह बता दिया कि वह मार्ग इधर नहीं है उधर है तो बस, ईश्वर के शरणापन्न होकर वह जीव परमानन्द प्राप्त कर लेता है, अन्यथा अनादिकाल से अनन्तकाल तक संसार से ही प्यार करता है । 

हम लोग अपना सब समय, आत्मशक्ति इसी में नष्ट कर रहे हैं कि लोग हमें अच्छा कहें, जबकि उपर्युक्त सिद्धान्त से यह सर्वथा असम्भव है । हम अच्छा बनने का प्रयत्न नहीं करते, हम अच्छा कहलाने का प्रयत्न करते हैं । परिणाम-स्वरूप हमारा जीवन दंभमय हो जाता है । प्रतिक्षण ऐक्टिंग, बनावट, एटीकेट के ही चक्कर में परेशान रहते हैं । जरा सोचिये कि संसार में अच्छे एवं बुरे दो प्रकार के लोग हैं एवं सदा रहेंगे । ईश्वर के क्षेत्र वाले अच्छे हैं, तीन गुणों के आधीन रहने वाले बुरे हैं । फिर उन बुरों में भी तामस से राजस अच्छे, राजस से सात्त्विक अच्छे हैं । 
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