प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 47)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 47) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
------------------
आप लोग सुनते होंगे, शास्त्रों में लिखा है कि कहीं स्वर्ग है, वहाँ बड़ा सुख है । कुछ लोग तदर्थ प्रयत्न करते हैं । किन्तु, वेद कहता है - 

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बाला:। 
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुरा: क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥   (मुण्डको. 1-2-9)

अर्थात् घोर मूर्ख लोग स्वर्ग लोक के हेतु प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वहाँ भी अज्ञान है, अशान्ति है, अतृप्ति है । वे स्वर्गादिक लोक शोक से परिपूर्ण हैं, सीमित हैं । कुछ दिन के पश्चात् स्वर्गलोक से नीचे गिरा दिया जायगा और मानवदेह भी छिन सकती है । परिणामस्वरूप कूकर, शूकर, कीट, पतंग आदि योनियों में दुःख भोगना पड़ेगा । इसी आशय से वेदव्यास जी ने कहा कि -

आद्यन्तवन्त एवैषां लोका: कर्मविनिर्मिता: । 
दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठा: क्षुद्रानन्दा: शुचार्पिता: ॥ (भाग. 11-14-11)

गीता में बताया कि -

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।   (गीता 9-21)

रामायण ने बताया कि 

स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदायी । 

भावार्थ यह कि स्वर्गादिक लोक भी हमारे लोक की भाँति प्राकृत हैं । वहाँ भी माया का आधिपत्य है । अतएव हमारा आध्यात्मिक सुख वहाँ भी सर्वथा अप्राप्य है । 

आश्चर्य यह है कि शास्त्र-वेद के माननेवाले भी इस उपर्युक्त बात पर विश्वास नहीं करते । तभी तो जगत् के पदार्थों द्वारा आनन्द की आशा में प्रयत्नशील हैं । यह मानव देह देव-दुर्लभ बतायी गयी है । वेदव्यासोक्ति के अनुसार -

नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् । 
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥   (भाग. 11-20-17)

रामायण कहती है 'सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थनि गावा।' अस्तु, जब देवता लोग मानवदेह चाहते हैं, तब मानव यदि स्वर्ग की जनता बनना चाहे तो कितना भोलापन होगा । आप कहेंगे, बात तो ठीक है, किन्तु आश्चर्य होता है कि स्वर्ग के लोग मानवदेह क्यों चाहते हैं? वहाँ उच्चकोटि के सुख प्राप्त हैं । मानव के मृत्युलोक के सुख तो उनके समक्ष नगण्य हैं । किन्तु, यदि आप यह रहस्य समझ लें तो आश्चर्य न होगा । स्वर्ग केवल भोग-योनि ही है । वहाँ केवल कर्म को भोगवाया जाता है, आप आगे कुछ नहीं कर सकते । किन्तु मानवदेह में भोग भोगने के साथ-साथ उन्नति करके अपने कर्मबन्धनों से छुटकारा पाने का भी सौभाग्य प्राप्त है । मानव साधना द्वारा सदा के लिये माया से उत्तीर्ण होकर आनन्दमय बन सकता है किन्तु स्वर्ग कर्मयोनि न होने के कारण इससे वंचित है । अतएव स्वर्ग-सम्बन्धी कामना की भावना से प्रयत्न करना घोर नासमझी है । आप लोग अपने पिता आदि पूज्यों के मरने पर कहा करते हैं कि हमारे पूज्य का स्वर्गवास हो गया किन्तु यह रहस्य समझ लेने पर आप ऐसा न कहेंगे क्योंकि वेदानुसार स्वर्ग जानेवाला जब घोर मूर्ख है तो आप अपने पूज्य को घोर मूर्ख क्यों बनायेंगे ।
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)