प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 40)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 40) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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कल्पना कीजिये कि उमेश नामक व्यक्ति है, उसके स्त्री है, एक बच्चा भी है, एक मित्र है, एक नौकर है, एक पड़ोसी है एवं एक कर्ज़दार पड़ोसी भी है । उस उमेश की अचानक मृत्यु हो गयी । उसकी स्त्री ने सुना और सुनते ही दुःख में मूर्छित होकर गिर पड़ी, पुत्र ने सुना, वह मूर्छित तो नहीं हुआ किन्तु अत्यन्त अधीर होकर रोने लगा, मित्र ने सुना, वह अधीर होकर नहीं रोया किन्तु दो चार आँसू निकल ही आये, नौकर ने सुना, उसे आँसू तो नहीं आये किन्तु हल्की सी वेदना अवश्य हुई । अब पड़ोसी ने भी सुना कि उमेश संसार से चल बसे, उन्हें न दुःख हुआ न सुख । उन्होंने अपनी झाड़ू लगाती हुई पत्नी से कहा 'अरी सुनती हो, वह पड़ोसी उमेश थे न, उनकी अभी मृत्यु हो गयी' । स्त्री को न दुःख हुआ न सुख, किन्तु सभ्यता के नाते उसने यह अवश्य कहा कि 'राम राम, बड़ा बुरा हुआ, उसका बच्चा अभी छोटा ही है, स्त्री युवती है । भगवान् की जैसी इच्छा'। ऐसा कहती हुई झाड़ू लगाती रही, झाड़ू लगाना उसने बन्द नहीं किया । अब दूसरे पड़ोसी को देखिये, उसने सुना कि उमेश मर गया तो उसे बड़ा सुख मिला, क्योंकि वह उसका कर्ज़दार था, सोचा चलो कर्ज़े से छुट्टी मिली ।
थोड़ी देर बाद ही उमेश जीवित हो गया । वास्तव में वह मरा नहीं था, अभिनय कर रहा था । उसको जीवित सुनकर उसकी स्त्री पुन: ख़ुशी से बेहोश हो गयी, पुत्र ने सुना वह ख़ुशी के आँसू बहाने लगा । दोस्त ने सुना, वह विशेष खुश हुआ, किन्तु पुत्र से कम । नौकर ने सुना, उसे भी हल्की ख़ुशी हुई । पड़ोसी ने सुना तो उसने फिर अपनी झाड़ू लगाती हुई पत्नी से कहा 'अरी सुनो तो, वह पड़ोसी जो मर गया था पुन: जीवित हो गया' । झाड़ू लगाते-लगाते ही स्त्री ने कहा 'चलो अच्छा हुआ बेचारे की गृहस्थी को कौन सम्हालता'। कर्ज़दार पड़ोसी ने सुना उसे महान कष्ट हुआ क्योंकि उसे कर्ज़ का रुपया देना पड़ेगा ।
अब आप बताइये कि उमेश में सुख है या दुःख है? या दोनों नहीं हैं? यदि सुख है तो जितना स्त्री को मिला है, उतना सुख है या उससे कम जो पुत्र को मिला है उतना सुख है या उससे कम जो मित्र को मिला है उतना सुख है? अथवा यह बताइये कि जो कर्ज़दार पड़ोसी को दुःख मिला है वह दुःख है ? अथवा यह बताइये कि जो पड़ोसी को न सुख मिला न दुःख वह है? कौन स्थिति उमेश में है? सबका अनुभव भिन्न है । अतएव यह सिद्ध हुआ कि उमेश में न सुख है न दुःख है । जिसने जितना सुख, स्वार्थपूर्ति की दृष्टि से, उमेश में मान लिया था बस, उसे वही अपना माना हुआ, उतनी ही मात्रा का सुख मिल रहा है और वह भोलेपन में यह समझ रहा है कि उमेश से सुख मिल रहा है । भावार्थ यह कि जिस वस्तु में जितनी मात्रा का सुख जो व्यक्ति मान लेता है, उस वस्तु से उतनी मात्रा का सुख उस व्यक्ति को मिलने लगता है और वह भ्रान्तिवश यह समझ बैठता है कि अमुक वस्तु में अमुक मात्रा का सुख मिल रहा है ।
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