प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 35)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 35) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
आत्म-स्वरूप
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अब आप विचार करें कि आप कौन हैं एवं आप आनन्द चाहते हैं या किसी और को चाहते हैं । आप कहेंगे कि मैं कौन हूँ यह तो नहीं जानता किन्तु इतना जानता हूँ कि मैं केवल अपना ही आनन्द चाहता हूँ । यदि आप मायिक तत्त्व होते तो मायिक पदार्थों से आपको आनन्द-प्राप्ति हो जाती, किन्तु आप ईश्वर के अंश हैं अतएव ईश्वरीय दिव्यानन्द से ही आप आनन्दमय हो सकते हैं । तर्कसम्मत सिद्धान्त भी है, साथ ही अनादिकाल के अनुभव से भी सिद्ध है कि यदि मायिक आनन्द से दिव्य जीव को दिव्य आनन्द मिलना होता तो अनन्तानन्त युगों से अब तक मायिक सुख मिलते हुए हम इस प्रकार दु:खी, अशान्त, अतृप्त, अपूर्ण न रहते । यह अनुभव-प्रमाण ही यह बोध कराने में समर्थ है कि हम मायिक नहीं हैं । फिर भी हमें इस तत्व पर गम्भीर विचार करना है ।
कुछ भोले प्रत्यक्षवादी कहते हैं कि इन्द्रियादि की भाँति आत्मा भी देह का परिणाम है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, बस इन्ही 4 तत्त्वों से देह एवं 'मैं' बना है । अर्थ एवं काम दो पुरुषार्थ हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण ही प्रमाण है । इन प्रत्यक्षवादियों में भी कोई देह को, कोई चक्षुरादि को, कोई प्राण को आत्मा मानते हैं, सांसारिक विषय- सुख को ही स्वर्ग एवं वियोगादि दुःख को ही नरकादि मानते हैं । उनका कहना है कि -
यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
अर्थात् जब तक जिये, सुख से जिये, कर्जा करके घी पिये ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: ।
( चार्वाक् )
मरने के बाद शरीर के साथ 'मैं' समाप्त हो जायगा ।
मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ आदि व्यवहार ज्ञान से देख कर यह कहना कि मैं देह हूँ, भोलापन हैं क्योंकि बाल्यादि अवस्था के परिवर्तन होने पर भी मैं वही हूँ यह ज्ञान सदा रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं होता । यदि मैं बालक हूँ, तो युवावस्था में यह ज्ञान न रहना चाहिये कि जो मैं बालक था, वही मैं युवा हूँ, इत्यादि ।
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