प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 32)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 32) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 4 -  शरणागति🌿

रामायण कहती है -

मन क्रम वचन छांडि चतुराई । भजतहिं कृपा करहिं रघुराई ॥

अर्थात् सर्वात्म-समर्पण से ही माया से मुक्ति एवं भगवत्कृपा का लाभ हो सकता है । भावार्थ यह कि हमें ईश्वर के शरणागत हो जाना है । ऐसी शरणागति के आधार पर ही ईश्वर-कृपा निर्भर है । जो जो जीवात्माएँ उसके शरणागत हो गयीं, वे-वे अपने परम चरम लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर चुकीं, जो-जो शरणागत नहीं हुई हैं उन्हीं के ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं हुई एवं वे ही अपने लक्ष्य से वञ्चित होकर 84 लाख योनियों में काल, कर्म, स्वभाव, गुणाधीन होकर चक्कर लगा रही हैं ।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म स्वभाव गुन घेरा ॥

अब  प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह तो सांसारिक सौदा हो गया कि हमने कुछ दिया तब ईश्वर ने कृपा की ।  किन्तु ऐसा समझना भोलापन है, क्योंकि शरणागत का अभिप्राय ही यह है कि हम कुछ न करें । कुछ न करने का नाम ही शरणागति है । जब तक नवजात बालक कुछ नहीं करता तब तक माँ सब कुछ करती रहती है; जब बालक कुछ कुछ करने लगता है तो माँ भी कुछ कुछ करना काम कर देती  है; जब बालक सब कुछ करने लगता है तब माँ कुछ नहीं करती । बस यही उदहारण पर्याप्त है । जब तक हम कर्तृत्वाभिमान रखते हैं तभी तक हमें कर्मबन्धन है एवं हम कर्त्ता घोषित किये जाते हैं, जहाँ हमारा कर्त्तापन समाप्त हुआ, हम अकर्ता सिद्ध हो गये और -

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।

इस गीतोक्ति के अनुसार हमारा योगक्षेम ईश्वर वहन करने लगा । अतएव यदि कुछ न करने रूपी शरणागति से माया से मुक्ति, त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिताप, पंचकोशादी से मुक्ति, परमानन्द, परम शान्ति की प्राप्ति हो जाय तो इससे बड़ी कृपा और क्या मानी जायगी ? यदि हम कुछ भी करते एवं पुन: ईश्वर की कृपा होती तब तो कुछ कहने का अवसर था किन्तु शरणागति से अर्थात् सब कुछ समर्पित कर देने से सब कुछ प्राप्त हो जाना अकारण-कृपा ही है ।  सब कुछ समर्पित करने में हमारा क्या ?  एक पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लिए जब तक भागता है, अन्य पक्षी उसका पीछा करते हैं एवं वह एक क्षण को भी चैन नहीं पाता है । जैसे ही वह सब कुछ समर्पित कर देता है बस अवकाश प्राप्त कर लेता है । भावार्थ यह है कि ईश्वर कृपा का कोई मूल्य  भी देना चाहे तो असंभव है क्योंकि जो वस्तु ईश्वर देते हैं वह दिव्य है एवं जो मूल्य जीव देगा वह प्राकृत एवं सदोष ही होगा । पुन: ईश्वर को उस प्राकृत वस्तु से क्या अभिप्राय है ।
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