प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 46)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 46) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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किन्तु, उपर्युक्त ब्रह्मलोक पर्यन्त के आनन्द में सर्वत्र एक सी ही अशान्ति, अतृप्ति तथा अपूर्णता रहती है । वास्तविक आनन्द इन सबसे करोड़ों कोस दूर है, जिसे पाने के पश्चात् व्यक्ति पूर्णकाम हो जाता है, सदा के लिए आनन्दमय हो जाता है, तृप्त हो जाता है, अमृत हो जाता है । गीता कहती है -
'आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन। (गीता 8-16)
अर्थात् हे अर्जुन, ब्रह्मलोक तक वास्तविक सुख नहीं है । वहाँ भी जाकर पुन: भवाटवी का चक्कर लगाना पड़ेगा । पुन: -
मामुपेत्य तू कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते । (गीता 8-16)
केवल मुझको एवं मेरे लोक को प्राप्त करके ही जीव मुक्त हो सकता है, परमानन्द प्राप्त कर सकता है । अब सोचिये, जब ब्रह्मलोक के ऐश्वर्य में भी आनन्द नहीं तो करोड़पति बन कर आनन्द चाहते हैं, कितना बड़ा आश्चर्य है ! कैसा भोलापन है । वेदव्यास जी कहते हैं -
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: ।
न दुह्यन्ति मन: प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते ॥ (भाग. 9-19-13)
अर्थात् सम्पूर्ण विश्व के सम्पूर्ण पदार्थ स्त्री आदि, यदि एक व्यक्ति को दे दिये जायें तो भी उसकी कामना उसी प्रकार बनी रहेगी, जैसे प्रारम्भ में थी । वेदव्यास जी पुन: कहते हैं -
गिरिर्महान् गिरेरब्धिर्महानब्धेर्नभो महत् ।
नभसोऽपि परं ब्रह्म ततोऽप्याशा दुरत्यया ॥
अर्थात् पहाड़ बड़ा होता है । उससे बड़ा समुद्र होता है । उससे बड़ा आकाश होता है । उससे बड़ा भगवान् होता है, जिसे अनन्त कहा जाता है किन्तु, उससे भी बड़ी एक वस्तु है, उसका नाम है वासना । भावार्थ यह कि अज्ञेय भगवान् को जाना जा सकता है, अचिंत्य भगवान् का चिन्तन किया जा सकता है, अदृष्ट भगवान् को देखा जा सकता है, अव्यवहार्य भगवान् को व्यवहार में लाया जा सकता है किन्तु, अनादि काल से अब तक के इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं हुआ, होगा, जो इन्द्रियों के विषयों के सामान को पाकर पूर्णकाम हो जाय, वे सामान भले ही ब्रह्मलोक की कक्षा के हों ।
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