प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 42)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 42) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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एक सुन्दर स्त्री को एक व्यक्ति रिवाल्वर से मारने जा रहा है एवं दूसरा व्यक्ति उस सुन्दरी को बचाने के लिये स्वयं सीना ताने खड़ा है । ऐसा क्यों? पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि वह सुन्दरी रिवाल्वर मारने वाले की स्त्री है किन्तु सीना ताने हुए व्यक्ति से प्रेम करती है । अब सोचिये सुन्दरता में सुख होता तो दोनों को बराबर-बराबर मिलता ।
शराब में बदबू आती है किन्तु शराबी को खुशबू आती है। प्याज लहसुन न खाने वाले को उसमें बदबू आती है किन्तु उसके प्रेमी को खुशबू आती है । हम कितना स्पष्ट कहें, गन्दगी के कीड़े को उसी में खुशबू आती है यदि उसे इत्र में छोड़ दिया जाय तो मर जायगा । अतएव सौंदर्य या सुगंध आदि में सुख नहीं है । जिस वस्तु में बार-बार सुख का चिन्तन किया जाता है उसी वस्तु में आसक्ति हो जाती है -
ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते । (गीता 2-62)
और उस वस्तु से सुख मिलने लगता है एवं उसके वियोग में दुःख ।
संसार की किसी वस्तु को पाने के पूर्व पर तथा पाने के पश्चात् छिन जाने पर अर्थात् उस वस्तु के वियोग में दुःख ही दुःख मिलता है । फिर भी व्यक्ति आशा में प्रयत्नशील है । कल्पना कीजिये एक स्त्री को पुत्र चाहिये । उसे पुत्र की प्राप्ति के लिए विवाह करना पड़ता है, पति की आधीनता स्वीकार करनी पड़ती है । किसी कारणवश यदि पुत्र फिर भी नहीं हुआ तो औषधि आदि उपचार करने पड़ते हैं । खैर, कल्पना कीजिये गर्भदान हो गया, अब तो सुख मिलना चाहिए । किन्तु एक क्षण को सुख मिलते ही यह दुःख सामने आया की अब ९ मास तक कष्ट सहना है, जब पुत्र पैदा हो जायगा तब सुख मिलेगा । ९ मास तक कितना बड़ा तप एक माँ करती है, उसे वह माँ भी नहीं महसूस कर सकती क्योंकि उसे भविष्य में होने वाले पुत्र की आशा की खुशी है । खैर, मान लो पुत्र हुआ । अब एक क्षण को खुशी हुई पुन: उसके संरक्षण की चिंता प्रारम्भ हो गयी, एवं उसके नष्ट हो जाने के भय की चिंता प्रारम्भ हो गयी । इस चिन्ता में पूरे जीवन परेशान रही । यदि कुपूत निकला तो दुःख, और मर गया तो घोर दुःख । भावार्थ यह कि सांसारिक किसी वस्तु की प्राप्ति के पूर्व तन्निमित्त प्रयत्न में कष्ट, वस्तु की प्राप्ति के पश्चात् उसकी रक्षा एवं उसके नष्ट होने के भय में कष्ट एवं नष्ट होने पर कष्ट ही कष्ट हैं ।
एक बात यह भी ध्यान में लाने की है कि किसी भी इच्छा की पूर्ति होने पर क्षणभंगुर सुख तो मिलता है किन्तु तत्क्षण ही लोभ उत्पन्न हो जाता है, एक लाख तो मिल गया, अब दो लाख कैसे मिले ? बस प्लानिंग (planning), प्रेक्टिस (practice) प्रारम्भ हो गई, फिर वही गोरखधंधा । और यदि इच्छा की पूर्ति न हुई तो क्रोध उत्पन्न होता है । इच्छा की पूर्ति या अपूर्ति में से एक अवश्य होगा, अतएव दुःख भी अवश्य होगा । यदि कहो कि इच्छा ही न की जाय तो यह असंभव है, क्योंकि जब तक वास्तविक परमानन्द न मिल जायगा तब तक कामनाओं का बनना स्वभावसिद्ध विषय है, उसे कोई भी व्यक्ति समाप्त नहीं कर सकता ।
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