प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 50)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 50) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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अब आप लोग सोचिये कि जब मात्रा का भेद हो जाने पर भी मैत्री तत्क्षण समाप्त हो जाती है तो भला यह सोचना कि मेरी स्त्री सदा मेरे अनुकूल रहे या पति अनुकूल रहे ! कितना असम्भव है । फिर कमाल यह कि आप लोग सम्पूर्ण विश्व से यही आशा रखते हैं कि सब हमारे अनुकूल रहें । इतना ही नहीं आप ऐसा समझते भी हैं कि हमारे अनुकूल बहुत से लोग हैं और यदि एक भी प्रतिकूल होता है तो आपको आश्चर्य एवं दुःख होता है । इन परिवर्तनशील गुणों का नाटक समझते होते, तब तो यदि एक भी व्यक्ति एक दिन के लिये भी आपके अनुकूल होता तो आपको आश्चर्य होता, किन्तु यहाँ तो विपरीत ही ज्ञान है कि एक भी व्यक्ति जब प्रतिकूल होता है, तब आपको आश्चर्य होता है । संसार में कोई न तो किसी के प्रतिकूल है, न तो अनुकूल ही है। बस, इन्हीं तीनों गुणों की मैत्री से कुछ क्षण के लिये मैत्री हो जाती है, पुन: विरोध होने से विरोध हो जाता है । अतएव यदि यह सिद्धान्त समझ में आ जाय तो किसी के प्रतिकूल होने पर दुःख न हो एवं सब को अनुकूल करने का व्यापार भी बन्द हो जाय ।
देखिये, यदि कोई पागल आपको गाली देता है और जवाब में आप भी उसे गाली देते हैं तो लोग कहते हैं कि यह भी पागल हो गया, क्योंकि पागल की बात पर विचार करके बुरा मानता है । यह तो बिचारा दुर्भाग्यवश पागल है ही, किन्तु यह जो आज तक समझदार था, आज यह कैसे पागल हो गया ? ठीक इसी प्रकार, जब संसार का प्रत्येक व्यक्ति परिवर्तनशील तीनों गुणों के आधीन बरबस हो रहा है तो उसकी किसी बात पर दुःख क्यों माना जाय । वह तो त्रिगुण का पागल है । वह तो बेचारा दयनीय है । क्रोध करना या दुःखी होना अपना ही पागलपन है ।
आपसे किसी ने कहा कि 'आप बुरे हैं' तो आप बुरा मानते हैं । बस, यह बुरा मानना ही सिद्ध करता है कि आप बुरे हैं । यदि आप अच्छे होते और वह बुरा कहता तो आप को सोचना चाहिये था कि वह गुणों का पागल है । यदि आप सचमुच ही बुरे हैं, तब भी बुरा मानने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह तो सच ही है । आप उन दोनों से नीचे चले गये जो एक वाक्य से अशान्त हो गये, क्रोध के चंगुल में फँस गये एवं स्पर्धायुक्त होड़ द्वारा अन्यान्य गलत कदम उठाने लगे इत्यादि ।
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