प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 37)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 37) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
आत्म-स्वरूप (Contd.)
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सुषुप्ति में अविद्या-युक्त चैतन्य ज्ञान का अनुभवकर्ता होता है एवं अंतःकरण-युक्त-चैतन्य 'स्मर्ता' जाग्रत में होता है ।
भावार्थ यह कि गहरी नींद में मन का अभाव रहता है अतएव आप मन आदि भी नहीं हैं । साथ ही यह व्यवहार में भी बोलते हैं एवं अनुभव करते हैं कि हमारा मन है, हमारी आँख हैं, हमारे कान हैं, हमारा शरीर है । तब फिर जो हमारा है, वह 'मैं' नहीं हो सकता । 'मैं' तो सदा 'मेरे' से पृथक् ही होगा । यदि तर्कयुक्त 'मैं' को पूछा जाय तो इतना ही उत्तर पर्याप्त है कि जो मेरा न हो, वही 'मैं' है ।
तात्पर्य यह कि 'मैं' प्राकृत पदार्थ नहीं । शेष, अंतःकरण एवं इन्द्रियादि, सब प्राकृत हैं । 'मैं' आप्त वाक्यों के अनुसार -
चिन्मात्रं श्रीहरेरंशं सूक्ष्ममक्षरमव्ययम् ।
कृष्णाधीनमिति प्राहुर्जीवं ज्ञानगुणाश्रयम् ॥ (वेद)
अर्थात् मैं ईश्वर का अंश हूँ, जिसे गीता में भी कहा है -
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: । (गीता 15-7)
ईश्वर अंश जीव अविनाशी । (रामायण)
अब यह सिद्ध हो गया कि 'मैं' इन्द्रिय, मन आदि नहीं अपितु ईश्वरीय अनादिकाल नित्य अंश हूँ । अतएव हमारा सुख ईश्वरीय होगा । संसार में हमारा सुख तर्क एवं अनुभव दोनों के विरुद्ध है । यही कारण है कि यद्यपि मन आदि अनन्त युगों से प्रतिक्षण मुझे यह धोखा देना चाहते हैं कि अब की बार मुझे अमुक वस्तु से सुख मिल जायगा, वह वस्तु मिलती भी है, परन्तु सुख नहीं मिलता । यदि हम मन बुद्धि के सजातीय होते तो उसके बहकाने में आ जाते किन्तु मैं दिव्य तत्व हूँ अतएव जब तक नित्यानन्द न प्राप्त हो जायगा तब तक महत्तम मायिक पदार्थों के पाने पर भी 'मैं' आनन्दमय नहीं हो सकता ।
अब आप संसार के सूक्ष्म एवं स्थूल रूप पर विस्तृत मीमांसा करें, क्योंकि यहाँ पर ही मन अटका हुआ है एवं बुद्धि का भी यह निश्चय सा बना हुआ है कि संसार में सुख अवश्य है एवं अवश्य मिलेगा तभी तो हम तदर्थ प्रतिक्षण प्रयत्नशील हैं ।
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