प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 33)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 33) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 4 -  शरणागति🌿

जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, द्रौपदी ने प्रथम पाँचों पतियों का बल मस्तिष्क में रखा । जब वे पति मौन हो गये तब बड़े-बड़े धर्माचार्य - द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विदुर, भीष्म पितामह आदि का अवलम्ब सोचने लगी । जब उधर से भी निराश हुई तब अपने दाँत से साड़ी दबायी । तब भी भगवान् नहीं आये । जब दु:शासन के एक ही झटके से दाँत से साड़ी नीचे गिरी तब पूर्णतया शरणागत हो गयी, यानि सब कुछ करना, सोचना बंद कर दिया । सब काम बन गया ।

भगवान् गीता में कहते हैं -

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज (गीता 18-66)

अर्थात् अर्जुन ! तू धर्माधर्म के चक्कर को छोड़कर केवल मेरी ही शरण में आ जा तो मैं न्यायी भगवान् अपने न्याय को समाप्त करके कृपा करके कृपा द्वारा तेरे समस्त जन्मों के समस्त पापों को क्षमा कर दूँगा। सोचिये यदि कोई अपराधी शरण में भी आ जाता है तो भी कोर्ट पिछले सारे अपराधों का दंड देती है, किन्तु ईश्वर इतना कृपामय है की यदि तुम एक बार पूर्ण शरणागत हो जाओ तो अनन्त जन्मों के अनन्तानन्त शुभाशुभ कर्मों से मुक्त करके अर्थात् क्षमा करके भविष्य में अनन्त काल के लिये योगक्षेम वहन करते हुए परमानन्द प्रदान कर देगा। यह कृपा नहीं है तो और क्या है ? अल्पज्ञ भी सोच सकता है । अतएव उपर्युक्त प्रश्न समाप्त हो गया कि ईश्वर मूल्य लेकर कृपा करता है । पुत्री के विवाह में केवल माँगने मात्र से बजाज का वस्त्र दे देना और उसके लिए कोई मूल्य कभी न माँगना कृपा है । धोबी का बिना मूल्य वस्त्र धोना कृपा है । ईश्वर का धोया अन्त:करण पुन: मैला नहीं होता है । पत्नी पति की शरण में आते ही पति की सारी संपत्ति की अधिकारिणी हो जाती है, परन्तु ईश्वर शरणागति उससे भी अत्युच्च है,

'तस्य कार्यं न विद्यते ।'  (गीता 3-17)

अब यह विचार करना है कि शरणागति किसकी की जाय, हमारे पास शरीर है, इन्द्रियाँ हैं, मन आदि है । पंचदशी कहती है -

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: । (ब्रह्मबिंदूपनिषद - 2)

अर्थात् बन्धन एवं मोक्ष का कारण मन ही है ।
वेदव्यास कहते हैं -

चेत: खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् ।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ॥  (भाग. 3-25-15)

अर्थात् मुक्ति एवं बंधन में मध्यस्थ कारण केवल मन ही है । अतएव हमें मन को ही ईश्वर के शरणागत करना है । मन के शरणागत होने पर सबकी शरणागति स्वयमेव हो जायगी । हम लोग शारीरिक क्रियादिकों से तो ईश्वर की शरणागति सदा ही करते हैं किन्तु मन की आसक्ति जगत में ही रखते हैं अतएव मन की आसक्ति के अनुसार जगत की ही प्राप्ति होती है । 
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