प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 51)

✨✨✨✨✨✨✨✨✨
🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 51) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
------------------
देखिये कितनी आश्चर्यजनक बात है । आप किसी से कहिये कि आप जरा क्रोधी हैं, बस, सुनते ही वह क्रोध से भर जाता है और कहता है, 'जबान संभाल कर बोलो, मैंने कब क्रोध किया है ?' अब जरा सोचिये कि वक्ता महोदय क्रोध में ही यह कह रहे हैं कि मैंने कब क्रोध किया है, फिर भी उत्तर की अपेक्षा में है । बस यही नाटक है कि जिसके ऊपर जो दोष अधिकार कर लेता है उसे यह नहीं प्रतीत होता है कि मेरे ऊपर कोई दोष आया है । क्योंकि जाननेवाली मशीन पर ही तो गुणों का अधिकार होता है, फिर वह अपने प्रतिकूल निर्णय कैसे करे? अकबर से किसी शराबी ने नशे में कहा, 'क्यों बे! हाथी बेचेगा?'

जरा सोचिये तो, संसार में किसी हेड कान्स्टेबिल का कोई परिचय कराता है कि आप हेड कान्स्टेबिल हैं तो वह मूँछ पर हाथ फेरता हुआ खुश हो जाता है लेकिन गुस्सा नहीं होता कि हमें कम से कम एस॰ पी॰ तो कहा होता । एक अंधे को लोग सूरदास कहते हैं, वह बुरा नहीं मानता । फिर बात क्या है कि जब हम दिन में पचासों बार कामी, क्रोधी, लोभी आदि हुआ करते हैं तो हमें यदि कोई कामी, क्रोधी, लोभी आदि कह देता है तो अकारण ही बुरा मान कर अशान्त हो जाते हैं एवं ज्वाला में दिन-रात जलते रहते हैं? उसका चिन्तन, मनन, फिर लोगों से कीर्तन, फिर क्रिया, भावार्थ यह कि नवधा-भक्ति सरीखी करने लगते हैं । क्या बढ़िया नाटक है । 

प्राय: संसार के सभी लोगों को एक बहुत बड़ी भ्रान्ति है । वह यह कि लोग हमारे अनुकूल हैं, हमसे प्रेम करते हैं । मैं चैलेंज के साथ  कह सकता हूँ कि विश्व में एक भी मायिक स्त्री अपने पति के सुख के लिये प्यार नहीं कर सकती । विश्व का कोई भी मायिक पति अपनी स्त्री के सुख के लिये प्यार नहीं कर सकता । विश्व का एक भी मायिक पिता अपने पुत्र के सुख के लिए उसे प्रेम नहीं कर सकता । भावार्थ यह कि जब स्त्री, पति एवं पिता, पुत्र एक दूसरे के सुख के लिये प्यार नहीं कर सकते तो अन्य से आशा करना तो पागलखाने के पागल से बढ़कर पागलपन है, जो हम लोग दिन रात किया करते हैं । 
✨✨✨✨✨✨✨✨✨

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 25)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 55)

प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 81)