प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 34)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 34) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 4 -  शरणागति🌿

यह अटल सिद्धान्त है कि मन की आसक्ति जहाँ होगी, बस उसी तत्व की प्राप्ति होगी । यदि हम शारीरिक कर्म अन्य करें एवं मानसिक आसक्ति अन्यत्र हो तो बस मन की आसक्ति का ही फल मिलेगा । अर्थात् यदि शरीरेन्द्रियों से शुभ या अशुभ कर्म करें एवं मन से कुछ न करें, केवल ईश्वर-शरणागत ही रहें तो कर्म का फल न मिलेगा, केवल ईश्वरीय लाभ ही मिलेगा । अतएव मन की शरणागति ही वास्तविक शरणागति है । जैसे पैरों को बाँध कर मार्चिंग नहीं हो सकती, मुख बंद करके स्पीच नहीं हो सकती, वैसे ही मन को अन्यत्र आसक्त करके ईश्वरोपासना भी नहीं हो सकती । वस्तुतस्तु मन की आसक्ति ही ईश्वरीय क्षेत्र में उपासना कहलाती है एवं जगत क्षेत्र में आसक्ति कहलाती है । 

दुइ कि होहिं इक संग भुआलू, हँसब ठठाइ फुलाउब गालू । 

के अनुसार मन संसार में भी आसक्त हो एवं ईश्वरोपासना भी होती रहे, यह सर्वथा असम्भव है क्योंकि एक मन एक काल में एक ही क्षेत्र में आसक्त हो सकता है । फिर मायिक एवं ईश्वरीय क्षेत्र परस्पर विरोधी क्षेत्र भी हैं । एक कथानक आप लोगों ने सुना होगा, मथुरा के चौबों का । बस, उसी प्रकार जैसे चौबे भाँग के नशे में लौह श्रृंखला में नाव को बाँध कर सारी रात उसे खेते रहे, अन्ततोगत्वा प्रात:काल अपने आपको उसी स्थान पर पाया, उसी प्रकार मन को धन, पुत्र, स्त्री, पति आदि में आसक्त करके ईश्वरोपासना अनन्तकाल तक करने पर भी अपने आपको मायिक जगत में ही पावेंगे । ईश्वरोपासना तो की ही नहीं, केवल शारीरिक रूप से ही पूजापाठ आदि किया, अतएव मन की आसक्ति का ही परिणाम प्राप्त होगा । गोपियों ने उद्धव से बड़ा ही सुन्दर कहा था, सूर के शब्दों में - 

ऊधो ! मन न भये दस बीस । 
एक हुतो सो गयो श्याम संग को अवराधे ईस । 

अर्थात् एक ही तो मन है, अगर अनेक मन होते तो एक मन को अन्यत्र एवं दूसरे को अन्यत्र एव तीसरे को अन्यत्र लगा देते । इस प्रकार जगदुपासना एवं ईश्वरोपासना दोनों ही चलती रहतीं, किन्तु ईश्वर पहिले ही जानता था कि अगर दो मन भी दे दिये तो जीव 'मामेकं शरणं व्रज' अर्थात् केवल मेरी ही उपासना न कर सकेंगे । अतएव मन की शरणागति ही ईश्वर-शरणागति है, कर्म चाहे जो हों, उनसे कोई अभिप्राय नहीं ।

अब यह विचार करना है कि मन की शरणागति में कठिनाई क्या है ? कठिनाई यह है कि चूँकि हमारा मन अनादिकाल से सांसारिक विषयों में ही आसक्त रहा है अतएव दृढ़मूल आसक्ति हो चुकी है । यदि हमारा मन, न संसार में आसक्त होता, न भगवान् में आसक्त होता तब तो सुगमता होती । अतएव सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि हम संसार का वास्तविक स्वरूप समझें एवं वहाँ से मन को उदासीन करें, तभी ईश्वर-शरणागति सम्भव है । 
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अध्याय 4 सम्पूर्ण 
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