प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 52)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 52) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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आप कहेंगे, हमारी स्त्री अथवा हमारा पति तो हमारे सुख के लिये कार्य करता है, प्रेम करता है । बस, यही तो धोखा है । आप नहीं समझते कि वह अपने सुख की ओट में आपके सुख का वाक्य बोलकर आपको ठग रहा है और आप बुद्धिमान भी कहलाते हैं । जब तक जीव अपना वास्तविक आनन्द प्राप्त न कर लेगा, यह असंभव है कि किसी के सुख के लिये कोई कुछ करे और करता दिखाई पड़ता है तो उसके पीछे कोई महान् स्वार्थ छिपा हुआ है जो भविष्य में प्रकट हो जाता है । यदि कोई स्त्री यह दावा करती है कि मैं पति के सुख के लिये प्यार करती हूँ तो जरा सी परीक्षा ले लीजिये । एक पत्र किसी स्त्री के नाम लिख दीजिये, भले ही वह स्त्री १०० वर्ष पूर्व मर चुकी हो । उसमें दो चार वाक्य भयानक लिख दीजिये की "मैं तुम्हीं से प्यार करता हूँ, अपनी स्त्री को तो बुद्धू बना रखा है, मैं इस प्रयत्न में हूँ कि इसे मार डालूँ और तुम्हारे ही साथ चैन की जिन्दगी बिताऊँ ।" बस, यह पत्र जैसे ही स्त्री पढ़ेगी, प्रेम समाप्त हो जायगा, घर में बवाल मच जायगा । फिर आप लाख समझायें कि यह तो मजाक किया है, पर शायद ही कोई स्त्री पूर्वावस्था में आवे । किन्तु ऐसा कोई कर मत डालना ।
अब सोचिये कि जब साधारण से नाटक से प्यार समाप्त हो गया तो यह क्या सिद्ध हुआ? यही न कि सब अपने सुख के लिए नाटक था? यदि पति का सुख चाहती हो तो पत्र पढ़कर धन्य हो जाती कि उन्हें जैसे सुख मिले, बस हम उसी में खुश हैं । एक आई॰ ए॰ एस॰ सरीखा बुद्धिमान भी अगर इसी प्रकार स्त्री की लिखी हुई किसी पुरुष के नाम की चिट्ठी पढ़ लेता है तो बड़े दावे से कहता है - "मैं बेवकूफ नहीं हूँ, आई॰ ए॰ एस॰ हूँ, सब समझता हूँ, मैं तुम्हें समझ गया ।" स्त्री लाख समझाये पर वह अपनी बुद्धि का दावा करते हुए कहता है - "अरे मुझे तो पहले ही संदेह था, मैं समझता था पर तुमसे कहता नहीं था, आज स्पष्ट हो गया", इत्यादि ।
जरा सोचिये, बुद्धिमान कहलाने वाला चार वाक्य में मूर्ख बन जाते हैं, तब फिर साधारण बुद्धिमान की तो बात ही क्या ? भावार्थ यह कि अपने सुख के लिए ही दूसरे को प्यार करते हैं । वेद कहता है -
न वा अरे पत्यु: कामाय पति: प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पति: प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्रा: प्रिया भवन्ति । (वृहदारण्यक 2-4-5, 4-5-6)
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