प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 45)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 45) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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यदि हम आपको सुखों की मात्रा का नाटक स्पष्ट बतायें तो आपको आश्चर्य होगा । अच्छा सुनिये, वेद में लिखा है कि -
सैषाऽनन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक: ।
आशिष्ठो द्रढ़िष्ठो बलिष्ठो तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णास्यात् ।
स एको मानुष आनन्द:। (तैत्तिरीय 2-8)
अर्थात् यदि कोई व्यक्ति सम्पूर्ण पृथ्वी का एकमात्र शासक हो एवं युवा हो, स्वस्थ हो, बुद्धिमान हो, प्रजा अनुगत हो, सर्व सांसारिक सुख-सम्पन्न हो तो वह मानव-लोक का सबसे बड़ा सुख है । किन्तु वेद कहता है -
ते ये शतं मानुषा आनन्दा: स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानंद: ।
अर्थात् उपर्युक्त ऐसे सैकड़ों राजाओं का सुख एक मानव-गन्धर्व के सुख के बराबर होता है । पुन: वेद कहता है -
ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानंदा: स एको देवगन्धर्वाणामानंद: ।
अर्थात् उपर्युक्त ऐसे सैकड़ों मानव-गन्धर्व का सुख मिलकर एक देवगन्धर्व के सुख के बराबर होता है । पुन: -
ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानंदा: स एक: पितृणां चिरलोकलोकानामानंद: ।
अर्थात् उपर्युक्त ऐसे सैकड़ों देवगन्धर्वों का सुख मिल कर एक पितृलोक के सुख के बराबर होता है । पुन: वेद कहता है -
ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानंदा: स एक आजानजानां देवानामानंद: ।
अर्थात् उपर्युक्त ऐसे सैकड़ों पितृलोकों का सुख मिलकर एक आजानज देव के सुख के बराबर होता है । पुन: वेद कहता है -
ते ये शतमाजानजानां देवानामानंदा: स एक: कर्मदेवानांदेवानामानंद:।
अर्थात् उपर्युक्त ऐसे सैकड़ों आजानज देवों का सुख मिलकर एक कर्मदेव के सुख के बराबर होता है । पुन: वेद कहता है -
ते ये शतं कर्मदेवानांदेवानामानंदा: स एको देवानामानंद:।
ते ये शतं देवानामानंदा: स एक इन्द्रस्यानन्द:। ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दा: स एका बृहस्पतेरानन्द: ।
अर्थात् ऐसे सैकड़ों कर्मदेवों के आनन्द मिलकर एक देव के आनन्द के तथा ऐसे सैकड़ों देवों के आनन्द मिलकर एक इन्द्र के आनन्द के बराबर होते हैं । ऐसे सैकड़ों इन्द्र के आनन्द मिल कर एक बृहस्पति के आनन्द के बराबर होते हैं ।
ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दा: स एक: प्रजापतेरानन्द: ।
ते ये शतं प्रजापतेरानन्दा: स एको ब्रह्मण आनन्द:।
(तैत्तिरीय 2-8)
अर्थात् ऐसे सैकड़ों बृहस्पति के आनन्द मिलकर एक प्रजापति के आनंद के बराबर होते हैं तथा ऐसे सैकड़ों प्रजापति के आनन्द मिलकर एक ब्रह्मा के आनन्द के बराबर होते हैं ।
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