प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 44)
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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 44) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य का स्वरूप🌿
संसार का स्वरूप (Contd.)
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जब बच्चे या बूढ़े किसी वस्तु को प्रदर्शनी आदि में प्रथम बार देखते हैं तो बड़ा आनन्द आता है । दूसरी बार वे प्रदर्शनी में ही नहीं जाते । कहते हैं 'अरे भाई, हम देख चुके हैं, अब उसे बार बार देखने को क्या जायें', अर्थात् सुख समाप्त हो गया । जब दुल्हन प्रथम दिन ससुराल आती है तब बिना बुलाये दर्शकों की भीड़ लगी रहती है, किन्तु पश्चात् बुलाने पर भी कोई नहीं जाता । दोष सब निकालते हैं; यह लम्बी है, ठिगनी है, बहुत बोलती है या गूंगी है, ढीठ है या ऐंठू है, देहाती है या टिपटाप (tiptop) है । भावार्थ यह कि दोनों पक्ष में उसकी बुराई ही बुराई होती है । अस्तु यह सिद्ध हुआ कि वस्तु की प्राप्ति के पश्चात् वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है । एक हाईकोर्ट जज (High Court Judge) के चपरासी को यह समझना कठिन है कि तुम्हें जो आनन्द साइकिल में मिलता है, वही आनन्द तुम्हारे साहब को मोटर में आता है, उससे थोड़ा भी अधिक नहीं है ।
कल्पना कीजिये, आज एक चपरासी ने बड़ी मुश्किल से 5-5 रुपया जोड़कर साइकिल प्रथम बार खरीदी है । आज उसे बड़ी खुशी है । साइकिल लिए अनावश्यक दौरा कर रहा है । उधर साहब ने भी प्रतिमाह रुपये बचा कर आज प्रथम बार मोटर खरीदी है । वह भी उतना ही खुश है एवं अनावश्यक रूप से ही मोटर लिए हार्न (horn) बजाता दोस्तों में घूम रहा है । किन्तु कुछ दिनों बाद साहब 6 घंटे का दौरा करके घर आया तो थकान के मारे बड़बड़ाने लगा की दौरा करना बड़ा कष्टप्रद है । उधर चपरासी भी 6 घंटे साइकिल चला कर घर आया । वह भी अपनी स्त्री से ऐसा ही कहता है । किन्तु जब चपरासी को यह बताया गया कि तुम्हारा साहब भी ऐसे ही परेशान है तो उसने उसे 1/100 भी नहीं माना और हँसने लगा कि हाँ साहब, गरीबों की खिल्ली ऐसे ही उड़ाई जाती है । वह यदि यह समझ ले कि जिस क्लास (class) में व्यक्ति कुछ दिन रह लेता है, उसमें उसे सुख नहीं मिलता तो उस न्यून क्लास (class) वाले की दौड़धूप ही बन्द हो जाय और वह शान्त हो जाय क्योंकि कामना-समाप्ति ही दुःख-निवृत्ति है ।
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