प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 41)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 41) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
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एक नियम यह भी समझ लेना चाहिये कि जब किसी वस्तु में सुख नहीं है, तो किसी वस्तु से दुःख भी नहीं मिल सकता । दुःख मिलना केवल सुख मिलने पर निर्भर है । देखिये, उमेश के मरने पर सर्वाधिक दुःख स्त्री को, उससे कम पुत्र को, उससे कम मित्र को, उससे कम नौकर को, न सुख न दुःख पड़ोसी को एवं सुख कर्ज़दार पड़ोसी को मिला । इसका भावार्थ यह है कि जिस व्यक्ति को जिस वस्तु के मिलने से जितना आनंद मिलता है, उस व्यक्ति को उस वस्तु के वियोग में उतना ही दुःख भी मिलता है । वस्तुत: उस वस्तु में दुःख नहीं होता, वह हमारी ही काल्पनिक मान्यता का परिणाम मात्र है । 

दूसरी बात यह भी है कि जिस वस्तु से जिसे जो सुख मिलता है वह भी प्रतिक्षण घटता हुआ होता है । जैसे, एक माँ अपने खोये हुए पुत्र के लिये दो दिन से रो रही है । उसकी अभिलाषा है कि एक बार पुत्र मिल जाता तो उसको दौड़ कर चिपटा कर प्यार कर लेती । मान लीजिये वह मिल गया । अब उसने दौड़ कर 'बेटा! बेटा!' कह कर बेटे को चिपटाया बड़ा आनन्द मिला । दूसरी बार चिपटाया। आनन्द कम मिला, तीसरी बार और कम, दसवीं बार न आनन्द न दुःख, ग्यारहवीं बार माँ यह कहने लगी कि 'बेटा जाओ, खेल आओ।' मगर बेटा अब भी गोद में चिपटा रहना चाहे तो माँ को दुःख भी होने लगता है और वह झल्ला कर कहती है, 'क्या तुम एक अनोखे बेटे हो जो हमेशा तुम्हें छाती पर चढ़ाये रहें और भी तो काम करना है ।'

आप लोग रसगुल्ला खाते होंगे । जब पहला रसगुल्ला खाते हैं तो बड़ा सुख, दूसरे में उससे कम सुख, तीसरे में और कम, दसवें में सुख न दुःख । ग्यारहवें में दुःख एवं पन्द्रहवें में इतना दुःख मिलता है कि आप चिल्ला पड़ते हैं कि 'अरे भाई मर जायेंगे, अब न खिलाओ, उल्टी होने वाली है।' यदि रसगुल्ले में सुख है तो यह कमीबेशी क्यों ? एवं पुन: दुःख क्यों ? यह सब धोखा है यह हमारी ही कल्पना का परिणाम है । 

प्यास लगने पर पानी प्रिय लगता है, प्यास समाप्त होते ही पानी अप्रिय लगता है । कामयुक्त पुरुष को स्त्री अच्छी लगती है, काम-रहित होने पर वही स्त्री भार सी लगती है । यह सब का स्वयं का अनुभूत विषय है । अतएव यह भ्रान्ति समझ में आ जानी चाहिए कि संसार का किसी वस्तु में सुख नहीं है, यह तो हमारी स्वयं की ही कल्पना का दुष्परिणाम है । देखिये, आप लोग यह समझते हैं कि सुन्दरता में सुख है, किन्तु आपकी अनुभूति इसके विपरीत होती है । जैसे एक माँ का कुरूप पुत्र मेले में खो गया है। वह कोतवाली में इकट्ठे अनेक बच्चे देखती है, किन्तु उसे सुख नहीं मिलता, उसे तो अपना काना कुरूप बच्चा ही सुखप्रद हो सकता है ।
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