प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 56)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 56) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
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आप लोग जो ईश्वर को मानते हैं उन्हें ईश्वर का वचन भी तो मानना चाहिये । आप कहेंगे, अवश्य मानेंगे तो सुनिये वेदव्यासजी कहते हैं -

तं भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम् ॥ (भाग. 10-27-16 ) 

यस्याहमानुगृह्णामी हरिष्ये तद्धनं शनै: ॥ (भाग. 10-88-8 )

अर्थात् भगवान् कहते हैं कि मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसके सांसारिक धन, पुत्र, स्त्री, पति, प्रतिष्ठादि सब छीन लेता हूँ ।  भावार्थ यह कि संसार का अभाव ईश्वर-कृपा है । संसार में कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो सिद्धान्त को हृदय से स्वीकार करते हैं ? केवल इने गिने व्यक्ति ही निकलेंगे जो इस सिद्धान्त को वास्तविक  रूप में मानते हों, अन्यथा तो, यदि प्रारब्धवश भी किसी का पुत्र जन्माष्टमी आदि को मर जाता है तो कई पीढ़ी तक जन्माष्टमी नहीं सहती । बोलिए जन्माष्टमी का क्या दोष है ? यह भी हमारा ज्ञान है । अतएव हमें संसार के वास्तविक स्वरूप धन, पुत्र, मित्र, स्त्री, पति, प्रतिष्ठा आदि से विरक्त होना है । इसके अभाव से विरक्त होने का अभिप्राय तो यही है कि हम संसार से प्रेम करते हैं और उसके अभाव से वैराग्य । 

आप लोग कह सकते हैं कि संसार के ऐश्वर्य रहते हुए ईश्वर-प्राप्ति नहीं हो सकती ? जनकादि बड़े-बड़े अमलात्मा परमहंसों का उदहारण तो हमारे समक्ष है । यह विचारणीय है कि -

साधनावस्था में संसार के बहिरंग ऐश्वर्यों से बचना है क्योंकि संसार के ऐश्वर्य बड़े-बड़े साधकों को पाताल में ढकेल देते हैं । 

नहिं को अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ (रामायण )

कुन्ती भगवान् से वर माँगती है -

विपद: सन्तु न: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो । 
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ (भाग. 1-8-25 )

अर्थात् मुझे सदा संसार के ऐश्वर्य का अभाव यानी विपत्ति ही दीजिये, क्योंकि सांसारिक वस्तुओं के अभाव में अहंकार न होगा, अकिंचन भाव उत्पन्न होगा, तभी आपकी ओर बढ़ सकेंगे । भावार्थ यह कि साधनावस्था में संसार से उतना ही सम्बन्ध रखना चाहिये कि मन की आसक्ति किसी पदार्थ में न होने पाए । तब सिद्धि प्राप्त होती है, तब जानकादि का उदाहरण लागू होता है ।  
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