प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 48)

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🙏🏼श्रीमद् सद्गुरु सरकार की जय🙏🏼
✨प्रेम रस सिद्धान्त (भाग 48) - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज✨
🌷"श्री राधे"🌷
🌿अध्याय 5 - आत्म-स्वरूप, संसार का स्वरूप तथा वैराग्य  का स्वरूप🌿

संसार का स्वरूप (Contd.)
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भावार्थ यह कि स्वर्ग या ब्रह्मलोक में आनन्द नहीं है । फिर हम मृत्युलोक के आंशिक ऐश्वर्य से आनन्द प्राप्ति की कामना करें, यह महान पागलपन है । हमें गम्भीरतापूर्वक सोचना चाहिये कि ईश्वर को छोड़कर जीव का वास्तविक आनन्द अन्यत्र कुत्रापि नहीं हो सकता क्योंकि शेष सब प्रकृति के आधीन हैं एवं प्रकृति के राज्य में आत्मा का सुख सर्वथा असंभव है । 

अब संसार का एक विलक्षण परिवर्तनशील स्वरूप समझिये । विश्व के प्रत्येक जीव के अंतःकरण में सत्त्व, रज, तम - तीनों गुण नित्य विद्यमान रहते हैं एवं तीनों गुण परिवर्तनशील रहते हैं अर्थात् किसी क्षण सात्त्विक, किसी क्षण राजस एवं किसी क्षण तामस गुणों के आधीन अंतःकरण हुआ करता है । जब जो गुण अंतःकरण पर बलवान् बनकर अधिकार किये रहता है, तब उसी गुण के विचार स्वाभाविक रूप में उत्पन्न होते हैं । भावार्थ यह कि इन तीनों गुणों के आधीन होने के कारण व्यक्ति दिन में कई बार सात्विक, कई बार राजस एवं कई बार तामस चित्तवृत्ति वाला बना रहता है । 

एक बात यह भी विचारणीय है कि इन तीनों गुणों में कौन गुण कब बलवान् हो जायगा, इसका कुछ निश्चय नहीं रहता । प्राय: ऐसा होता है कि जिस गुण का वातावरण बाह्य जगत में अधिक मिलता है, वही गुण बलवान् हो जाता है, शेष दो दब जाते हैं । 

एक बात और विचारणीय है कि सात्त्विक गुणों के विचारों की कमी के कारण सात्त्विक वातावरण अधिक मिलने पर ही कभी-कभी मनुष्य सात्त्विक प्रवृत्ति वाला होता है । किन्तु, राजस विचाराभ्यास के बाहुल्य के कारण राजस वातावरण थोड़ा भी मिलने से रजोगुण बलवान् हो जाता है । उसी प्रकार तामस तो सबसे बलवान् है ही । जैसे, कल्पना कीजिये कि आप देवोपासना कर रहे हैं, सात्विक जगत में हैं, इतने में आपकी स्त्री अथवा पुत्र प्यार से शब्द एवं प्यार का व्यवहार करते हुए आये । आपने उनका दर्शन तथा स्पर्श प्राप्त किया बस, आप तत्क्षण राजस बन गये । इतने में ही आपका पड़ोसी आया और उसने आते ही कहा, 'क्यों बे तू नंबरी बदमाश है', बस इतना सुनते ही राजस गुण का परित्याग करके क्रोधयुक्त तामस प्रवृत्ति वाले बन गये एवं मारपीट की नौबत आ गयी । यह परिवर्तनशील गुणों का प्रतिक्षण का नाटक है ।
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